बिलासपुर के बड़े सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल, सिम्स और जिला अस्पताल में मरीजों की बढ़ी परेशानी
सीटी स्कैन, एमआरआई और सोनोग्राफी के लिए 3 से 4 सप्ताह का इंतजार, जरूरी दवाओं की कमी और रात में डॉक्टरों की अनुपस्थिति ने स्वास्थ्य सेवाओं पर खड़े किए गंभीर सवाल
बिलासपुर। संवाददाता अतुल अग्निहोत्री।
छत्तीसगढ़ के न्यायधानी बिलासपुर में बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा करने वाली सरकारी व्यवस्था की जमीनी हकीकत चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है। संभाग के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में शामिल छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) और जिला अस्पताल में मरीजों को उपचार के लिए जिस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, उससे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिन अस्पतालों को आम जनता, गरीबों, मजदूरों, किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए जीवनरक्षक सहारा होना चाहिए, वहां मरीजों को इलाज के साथ-साथ जांच, दवाइयों और चिकित्सकों की उपलब्धता के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
स्थिति यह है कि गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों को सीटी स्कैन, एमआरआई और सोनोग्राफी जैसी महत्वपूर्ण जांचों के लिए तीन से चार सप्ताह तक इंतजार करना पड़ रहा है। वहीं जिला अस्पताल में रात के समय आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कई मौकों पर चिकित्सकों की अनुपस्थिति में मरीजों को नर्सिंग स्टाफ के भरोसे रहना पड़ता है। दूसरी ओर, अस्पतालों में मुफ्त दवाइयां उपलब्ध कराने के दावों के बावजूद मरीजों को कई जरूरी दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं।
यह स्थिति केवल अस्पतालों की व्यवस्थागत कमी का मामला नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर आम नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा विषय है। स्वास्थ्य सेवाओं में थोड़ी सी लापरवाही भी किसी मरीज के लिए गंभीर परिणाम का कारण बन सकती है।
सिम्स में मरीजों की भारी भीड़, उपचार के लिए घंटों इंतजार
बिलासपुर स्थित सिम्स संभाग का एक प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थान है। यहां बिलासपुर जिले के अलावा आसपास के अनेक जिलों और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों से मरीज उपचार कराने पहुंचते हैं। बड़ी संख्या में मरीजों के पहुंचने के कारण ओपीडी में सुबह से ही लंबी कतारें लग जाती हैं।
सुबह लगभग नौ बजे से पर्ची काउंटर से लेकर चिकित्सकों के कक्ष तक मरीजों और उनके परिजनों की भीड़ देखी जाती है। मरीजों को पंजीयन कराने, चिकित्सक से परामर्श लेने और आगे की जांच कराने के लिए काफी समय लगाना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों के लिए यह परेशानी और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि उन्हें आने-जाने का खर्च उठाने के साथ पूरा दिन अस्पताल में बिताना पड़ता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि कई बार चिकित्सकीय परामर्श मिलने के बाद भी मरीजों को तत्काल जांच की सुविधा नहीं मिल पाती। उन्हें जांच की अगली तारीख दे दी जाती है। इस कारण बीमारी की गंभीरता और मरीज की आर्थिक स्थिति के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाती है।
आधुनिक मशीनें उपलब्ध, फिर भी जांच के लिए तीन से चार सप्ताह की वेटिंग
सरकारी अस्पतालों में आधुनिक जांच सुविधाएं स्थापित करने का उद्देश्य गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को निजी अस्पतालों के महंगे खर्च से बचाना है। लेकिन सिम्स में उपलब्ध सीटी स्कैन, एमआरआई और सोनोग्राफी जैसी सुविधाओं का लाभ मरीजों को समय पर नहीं मिल पा रहा है।
जानकारी के अनुसार, इन महत्वपूर्ण जांचों के लिए मरीजों को तीन से चार सप्ताह तक की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए इतना लंबा इंतजार किसी बड़ी परेशानी से कम नहीं है।
यदि किसी मरीज को चिकित्सक तत्काल सोनोग्राफी या अन्य जांच कराने की सलाह देता है और उसे 20 से 25 दिन बाद की तारीख मिलती है, तो उसके सामने दो ही विकल्प बचते हैं। या तो वह बीमारी के साथ इंतजार करे अथवा अपनी आर्थिक क्षमता से बाहर जाकर निजी जांच केंद्र में हजारों रुपये खर्च करे।
जरहाभाठा निवासी हिमराज सोनवानी ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि उनके स्वजन को सिम्स में सोनोग्राफी कराने की सलाह दी गई थी। चिकित्सकीय स्थिति को देखते हुए तत्काल जांच जरूरी बताई गई, लेकिन जांच केंद्र में उन्हें 25 दिन बाद की तारीख दी गई। इसके बाद परिवार को मजबूरी में निजी जांच केंद्र का सहारा लेना पड़ा।
यह उदाहरण सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में उपलब्ध संसाधनों और मरीजों को मिलने वाली वास्तविक सुविधा के बीच अंतर को उजागर करता है।
जिला अस्पताल में करोड़ों की सीटी स्कैन मशीन, लेकिन संचालन पर सवाल
सिम्स के साथ जिला अस्पताल की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली बताई जा रही है। जिला अस्पताल में सीटी स्कैन मशीन स्थापित होने के बावजूद इसके संचालन और उपलब्धता को लेकर समस्याएं सामने आई हैं।
बताया जा रहा है कि मशीन के संचालन के लिए आवश्यक विशेषज्ञ और तकनीकी व्यवस्था उपलब्ध कराने में परेशानी आ रही है। सीमित जांच होने के कारण मरीजों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
सवाल यह है कि जब सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर अस्पतालों में आधुनिक मशीनें स्थापित करती है, तो उनके नियमित संचालन के लिए आवश्यक मानव संसाधन और तकनीकी व्यवस्था पहले से सुनिश्चित क्यों नहीं की जाती?
मशीनें स्थापित कर देना ही स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार नहीं है। उनका नियमित संचालन, प्रशिक्षित कर्मचारी, विशेषज्ञ चिकित्सक और मरीजों को समय पर जांच उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है।
यदि मशीन उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को निजी केंद्रों में जाना पड़े, तो सरकारी निवेश का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
रात के समय आपातकालीन सेवाओं पर गंभीर सवाल
किसी भी सरकारी अस्पताल की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल दिन की ओपीडी से नहीं, बल्कि रात के समय मिलने वाली आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं से भी होता है। सड़क दुर्घटना, हार्ट अटैक, सांस लेने में परेशानी, गंभीर चोट, प्रसव पीड़ा और अचानक बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति जैसी घटनाएं समय देखकर नहीं आतीं।
ऐसे में अस्पताल में चौबीसों घंटे चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध होना अनिवार्य है।
जिला अस्पताल को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार, रात के समय आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था में चिकित्सकों की उपलब्धता को लेकर शिकायतें हैं। आरोप है कि कुछ परिस्थितियों में मरीजों को तत्काल चिकित्सकीय परामर्श और उपचार मिलने में कठिनाई होती है तथा नर्सिंग स्टाफ के भरोसे आपातकालीन सेवाएं संचालित होती नजर आती हैं।
उसलापुर निवासी लक्ष्मण प्रसाद लहरे ने बताया कि आसपास के लोग कई बार रात के समय स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर जिला अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन आपातकालीन उपचार के लिए उन्हें परेशानी उठानी पड़ती है। यदि किसी गंभीर मरीज को समय पर चिकित्सकीय सहायता नहीं मिले तो परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
यह मामला स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रबंधन के लिए गंभीरता से विचार करने योग्य है। आपातकालीन सेवाओं में किसी भी प्रकार की लापरवाही की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
जीवनरक्षक दवाओं की कमी से गरीब मरीजों की बढ़ रही परेशानी
सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क दवाइयां उपलब्ध कराने की व्यवस्था आम नागरिकों के लिए बड़ी राहत मानी जाती है। विशेषकर गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं।
लेकिन सिम्स और जिला अस्पताल में जरूरी दवाओं की उपलब्धता को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं। मरीजों का कहना है कि चिकित्सक द्वारा लिखी गई सभी दवाइयां अस्पताल के दवा वितरण केंद्र में नहीं मिलतीं। कई बार कुछ दवाइयां उपलब्ध होती हैं, जबकि बाकी दवाइयां बाहर से खरीदने के लिए कहा जाता है।
जरहाभाठा निवासी नागेंद्र ठाकुर के अनुसार, सिम्स हो या जिला अस्पताल, मुफ्त दवाइयां प्राप्त करने के लिए मरीजों और उनके परिजनों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। चिकित्सक तीन प्रकार की दवाइयां लिखते हैं तो कई बार उनमें से केवल दो ही अस्पताल में उपलब्ध होती हैं।
दिल, किडनी और लिवर जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए नियमित दवाइयां बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। इन दवाइयों की अनुपलब्धता से मरीजों का उपचार प्रभावित हो सकता है।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बार-बार बाहर से महंगी दवाइयां खरीदना आसान नहीं होता। कई परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा इलाज में खर्च कर देते हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
मरीजों को रेफर करना ही समाधान नहीं, जिला अस्पताल में सुविधाओं का विस्तार जरूरी
जिला अस्पताल का उद्देश्य केवल मरीजों को प्राथमिक उपचार देकर बड़े अस्पतालों में रेफर करना नहीं होना चाहिए। जिला अस्पतालों में उपलब्ध संसाधनों के अनुसार अधिकतम उपचार सुविधाएं विकसित करना भी जरूरी है।
जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल में चिकित्सकीय सुविधाओं और विशेषज्ञों की उपलब्धता को लेकर भी शिकायतें हैं। कुछ मरीजों और परिजनों का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त उपचार मिलने से पहले ही सिम्स रेफर कर दिया जाता है।
इसका सीधा असर सिम्स पर पड़ता है। पहले से ही मरीजों की भारी भीड़ का सामना कर रहे सिम्स में जिला अस्पताल से आने वाले मरीजों का अतिरिक्त दबाव बढ़ जाता है।
यदि जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक, जांच सुविधाएं, पर्याप्त दवाइयां और आवश्यक उपकरण नियमित रूप से उपलब्ध हों, तो कई मरीजों का उपचार वहीं संभव हो सकता है। इससे सिम्स पर दबाव कम होगा और गंभीर मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी।
जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेही तय करनी होगी
स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। अस्पतालों में भवन निर्माण, आधुनिक उपकरणों की खरीदी और सुविधाओं के विस्तार पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन इन संसाधनों का वास्तविक लाभ तब मिलता है, जब मरीजों को बिना अनावश्यक परेशानी के समय पर उपचार मिले।
बिलासपुर के सिम्स और जिला अस्पताल की स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग तथा जिला प्रशासन को कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए।
- सीटी स्कैन, एमआरआई और सोनोग्राफी की जांच के लिए प्रतीक्षा अवधि कम की जाए।
- जरूरत के अनुसार जांच मशीनों के संचालन का समय बढ़ाया जाए।
- जिला अस्पताल की सीटी स्कैन मशीन का नियमित संचालन सुनिश्चित किया जाए।
- रात के समय विशेषज्ञ चिकित्सकों और आपातकालीन मेडिकल स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित हो।
- जीवनरक्षक और आवश्यक दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक रखा जाए।
- मरीजों को अनावश्यक रूप से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर करने की प्रवृत्ति पर निगरानी रखी जाए।
- अस्पतालों में उपलब्ध संसाधनों, मशीनों और चिकित्सकों की नियमित समीक्षा हो।
- मरीजों की शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई जाए।
सिम्स प्रबंधन ने माना मरीजों का दबाव क्षमता से अधिक
इस पूरे मामले में सिम्स के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. लखन सिंह ने बताया कि अस्पताल में मरीजों का दबाव निर्धारित क्षमता से काफी अधिक रहता है। इसके बावजूद प्रबंधन सभी मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है।
उन्होंने बताया कि सीटी स्कैन और एमआरआई की प्रतीक्षा अवधि कम करने के लिए मशीनों के संचालन का समय बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही अन्य व्यवस्थाओं को भी धीरे-धीरे दुरुस्त करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
वहीं जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. एस. कुजूर से इस संबंध में जानकारी लेने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। इसलिए जिला अस्पताल प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आ पाया।
सबसे बड़ा सवाल: आखिर गरीब मरीज जाएं तो कहां जाएं?
बिलासपुर संभाग के हजारों परिवार बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जो निजी अस्पतालों में इलाज कराने की आर्थिक क्षमता नहीं रखते।
सरकारी अस्पतालों में यदि जांच के लिए हफ्तों इंतजार करना पड़े, जरूरी दवाइयां बाहर से खरीदनी पड़ें और रात में आपातकालीन उपचार के लिए परेशानी उठानी पड़े, तो आम नागरिकों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो जाता है।
सरकार का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को सुलभ, सस्ता और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य उपचार उपलब्ध कराना है। इसके लिए अस्पतालों में केवल संसाधन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी जवाबदेही और उपयोगिता भी सुनिश्चित करनी होगी।
सिम्स और जिला अस्पताल जैसे प्रमुख चिकित्सा संस्थानों की व्यवस्था में सुधार केवल बिलासपुर की जरूरत नहीं, बल्कि पूरे संभाग के मरीजों के हित से जुड़ा विषय है।
अब जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जमीनी स्तर पर सुधार करें, ताकि सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाला कोई भी मरीज इलाज के अभाव में भटकने को मजबूर न हो। आखिर सरकारी अस्पताल जनता के भरोसे का केंद्र हैं और इस भरोसे को बनाए रखना व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
ग्रामीण भारत न्यूज
संवाददाता : अतुल अग्निहोत्री
बिलासपुर, छत्तीसगढ़




















