कर्जत-भीमाशंकर के जंगलों में पेड़ों की कटाई पर सियासी घमासान, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने महायुति सरकार को घेरा; टोरेंट पावर परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव पर उठाए गंभीर सवाल
कांग्रेस ने परियोजना स्थल का दौरा कर ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं, हजारों रोजगार और लाखों पेड़ लगाने के सरकारी दावों पर उठाए सवाल; 33 करोड़ पौधारोपण अभियान का हिसाब मांगते हुए पर्यावरण संरक्षण को लेकर सरकार को घेरा।
मुंबई/कर्जत। महाराष्ट्र के कर्जत-भीमाशंकर क्षेत्र के जंगलों में टोरेंट पावर कंपनी की प्रस्तावित परियोजना को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई किए जाने के आरोपों के बीच कांग्रेस ने राज्य की महायुति सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने परियोजना स्थल का दौरा कर पर्यावरण संरक्षण, जंगलों की सुरक्षा और स्थानीय ग्रामीणों के हितों को लेकर राज्य सरकार से कई सवाल पूछे हैं।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने गुरुवार को कर्जत-भीमाशंकर क्षेत्र पहुंचकर स्थानीय ग्रामीणों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और परियोजना से पर्यावरण तथा स्थानीय जनजीवन पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर जानकारी ली। इसके बाद मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने महायुति सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए।
सपकाल ने आरोप लगाया कि एक तरफ सरकार उद्योगों के विकास, रोजगार सृजन और बड़े पैमाने पर पौधारोपण के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जंगलों में पेड़ों की कटाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता।
रोजगार और पौधारोपण के दावों पर कांग्रेस ने मांगा जवाब
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने टोरेंट पावर परियोजना को लेकर सरकार की ओर से किए जा रहे दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि परियोजना के माध्यम से हजारों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने और लाखों पेड़ लगाने की बातें कही जा रही हैं। लेकिन वास्तविक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यदि किसी परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई किस तरह की जाएगी। केवल घोषणाएं करने से पर्यावरण संरक्षण नहीं होता, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणाम भी जरूरी हैं।
सपकाल के मुताबिक, विकास और रोजगार के नाम पर जंगलों को नुकसान पहुंचाने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन किया जाना चाहिए। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे वन्यजीवों, स्थानीय पारिस्थितिकी, जल स्रोतों और आसपास रहने वाले लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण आधार होते हैं।
‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का दिलाया स्मरण
हर्षवर्धन सपकाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का उल्लेख करते हुए केंद्र और राज्य सरकार की पर्यावरण संबंधी प्रतिबद्धताओं पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने देशभर में पौधारोपण के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया है। ऐसे में महाराष्ट्र के जंगलों में पेड़ों की कटाई को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार को गंभीरता से जवाब देना चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कर्जत के जंगलों में पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण के प्रयास किए हैं। उनका कहना था कि एक तरफ देशवासियों से पेड़ लगाने की अपील की जाती है, वहीं दूसरी तरफ जंगलों की कटाई को लेकर सवाल सामने आ रहे हैं। सरकार को अपने पर्यावरण संरक्षण के संकल्प और जमीनी कार्रवाई के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहिए।
उद्योगपतियों के हितों को प्राथमिकता देने का लगाया आरोप
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने राज्य सरकार पर उद्योगपतियों के हितों को प्राथमिकता देने और पर्यावरण संरक्षण की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि किसी भी औद्योगिक परियोजना का उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसके साथ सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि कर्जत-भीमाशंकर के जंगलों में प्रस्तावित परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों की चिंताओं और पर्यावरणीय प्रभावों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। सपकाल ने परियोजना की कार्यप्रणाली और पेड़ों की कटाई को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि महाराष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कमीशन के लालच में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े जरूरी पहलुओं की अनदेखी की जा रही है। हालांकि, ये आरोप कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की ओर से लगाए गए हैं। इन आरोपों पर संबंधित कंपनी और राज्य सरकार का पक्ष सामने आना भी जरूरी है।
33 करोड़ पेड़ लगाने के पुराने संकल्प का हिसाब मांगा
हर्षवर्धन सपकाल ने महाराष्ट्र सरकार के पुराने वृक्षारोपण अभियान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पूर्व में राज्य सरकार की ओर से 33 करोड़ पेड़ लगाने का संकल्प लिया गया था। इस अभियान को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन अब सवाल यह है कि उस अभियान के तहत लगाए गए पेड़ वास्तव में कहां हैं और वर्तमान में उनकी स्थिति क्या है?
उन्होंने सरकार से पूछा कि पौधारोपण अभियान के दौरान लगाए गए पौधों में से कितने पेड़ जीवित हैं, कितने पौधे नष्ट हो गए और उनकी देखरेख की जिम्मेदारी किस विभाग ने निभाई?
उनका कहना था कि पौधारोपण के आंकड़े जारी करना ही पर्याप्त नहीं है। पौधों का संरक्षण, नियमित निगरानी और उनकी वास्तविक वृद्धि का मूल्यांकन भी जरूरी है। यदि सरकार पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है तो उसे वृक्षारोपण अभियानों की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
जंगलों की सुरक्षा और ग्रामीणों के हितों को लेकर बढ़ा विवाद
कर्जत-भीमाशंकर का वन क्षेत्र प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे क्षेत्रों में किसी भी बड़ी औद्योगिक या ऊर्जा परियोजना को लेकर पर्यावरणीय प्रभाव, वन क्षेत्र की स्थिति और स्थानीय लोगों के हितों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक होता है।
टोरेंट पावर परियोजना को लेकर सामने आए विवाद ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को चर्चा में ला दिया है।
एक ओर औद्योगिक परियोजनाओं से रोजगार, ऊर्जा और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद रहती है, वहीं दूसरी ओर जंगलों की कटाई, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस मामले में स्थानीय ग्रामीणों की चिंताओं, परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय आकलन और पेड़ों की कटाई की अनुमति से संबंधित तथ्यों को सार्वजनिक करना महत्वपूर्ण होगा।
सरकार से जवाबदेही की मांग, आंदोलन की चेतावनी
हर्षवर्धन सपकाल ने चेतावनी दी कि महाराष्ट्र के लोग अपने राज्य के प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के हितों की रक्षा करना सभी राजनीतिक दलों और सरकार की जिम्मेदारी है।
कांग्रेस ने इस पूरे मामले को केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ा विषय बताया है।
अब इस मामले में राज्य सरकार और टोरेंट पावर कंपनी की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है। साथ ही यह भी देखना होगा कि परियोजना के लिए कितने पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है, इसके लिए कौन-कौन सी पर्यावरणीय एवं वन संबंधी अनुमतियां प्राप्त की गई हैं और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए क्या ठोस व्यवस्था की गई है।
विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं। औद्योगिक प्रगति और रोजगार के अवसरों के साथ जंगलों, जल स्रोतों और जैव विविधता की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। कर्जत-भीमाशंकर का यह विवाद सरकार के सामने यही सवाल खड़ा कर रहा है कि विकास की योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है।
ग्रामीण भारत न्यूज
संवाददाता : झसकेतन राजहंस



















