ग्रामीण भारत न्यूज: ब्यूरो रिपोर्ट
राज्य सरकार की नई पहल, 33 जिलों में विकेंद्रीकृत वितरण। राष्ट्रीय लक्ष्य 2030 तक सर्पदंश मौतों में 50 प्रतिशत कमी। झाड़-फूंक की परंपरा बनी सबसे बड़ी चुनौती।
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*रायपुर।* मानसून के दस्तक देते ही छत्तीसगढ़ के जंगलों और खेतों में एक खतरा हर साल बढ़ जाता है। वह खतरा है सर्पदंश का। भारी बारिश के कारण जब साँपों के बिल पानी से भर जाते हैं तो वे सुरक्षित जगह की तलाश में घरों, खेतों और बस्तियों की ओर निकल पड़ते हैं। इसी खतरे को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने इस बार समय रहते एक बड़ा कदम उठाया है।
राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने मानसून शुरू होने से पहले ही सभी 33 जिलों में पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम यानी ASV की 1 लाख से अधिक शीशियों का अग्रिम स्टॉक तैयार कर लिया है। कुल 1,00,960 शीशियों को जिलों की जरूरत और पिछले सालों के आंकड़ों के आधार पर बांटा गया है। इसका मकसद एक ही है – सर्पदंश से होने वाली मौतों को शून्य के करीब लाना।
*रणनीतिक वितरण, हाई-रिस्क जिलों पर फोकस*
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस बार दवाओं का वितरण अंधाधुंध नहीं किया गया है। बल्कि हर जिले में पिछले 5 सालों में आए सर्पदंश के केस, जंगल का क्षेत्रफल और आदिवासी आबादी को ध्यान में रखकर स्टॉक भेजा गया है।
सबसे ज्यादा खतरा वाले जिलों में सबसे अधिक शीशियां भेजी गई हैं। रायगढ़ जिले को 6,401 शीशियां, बलरामपुर को 6,280 शीशियां और जशपुर को 6,063 शीशियां दी गई हैं। ये तीनों जिले घने जंगलों से घिरे हैं और यहां आदिवासी बहुल गांव बहुत हैं। इसके अलावा सरगुजा, कोरबा, कोरिया और कांकेर जैसे जिलों में भी अतिरिक्त स्टॉक रखा गया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पतालों में ये शीशियां पहले से पहुंचा दी गई हैं। ताकि मरीज को रेफर करने में समय बर्बाद न हो और तुरंत इलाज शुरू हो सके।
*क्या है पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम*
आपके मन में सवाल होगा कि आखिर ये ASV है क्या? सरल भाषा में समझें तो ये एक जैविक दवा है। इसे “प्रतिविष” भी कहते हैं।
भारत में पाए जाने वाले 4 सबसे खतरनाक साँपों के जहर को निष्क्रिय करने के लिए इसे बनाया गया है। इन्हें “बिग फोर” कहा जाता है।
1. *कॉमन कोबरा* – नाग
2. *कॉमन करैत* – सबसे जहरीला और रात में काटने वाला
3. *रसेल वाइपर* – खून को पतला कर देता है
4. *सॉ-स्केल्ड वाइपर* – छोटा पर बहुत खतरनाक
इन चारों के जहर के खिलाफ एक ही शीशी काम करती है। इसीलिए इसे पॉलीवैलेंट कहा जाता है। डॉक्टर मरीज के लक्षण देखकर तय करते हैं कि जहर का असर नर्व पर है या खून पर और उसी हिसाब से खुराक देते हैं।
*मानसून में खतरा क्यों बढ़ जाता है*
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि जून से सितंबर के बीच सर्पदंश के मामले 3 गुना बढ़ जाते हैं। इसके पीछे 3 मुख्य कारण हैं।
पहला, बारिश से साँपों के बिल पानी से भर जाते हैं। सांस लेने के लिए वे ऊंची और सूखी जगह ढूंढते हैं जो अक्सर घर के कोने, अनाज की बोरियां या झोपड़ियां होती हैं।
दूसरा, खेतों में धान की रोपाई और दूसरे कृषि कार्य शुरू हो जाते हैं। किसान नंगे पैर और रात में खेतों में काम करते हैं। इसी दौरान पैर में डसने की घटनाएं बढ़ती हैं।
तीसरा, गांवों में गर्मी के कारण लोग जमीन पर या चारपाई के नीचे सोते हैं। रात में करैत जैसे साँप बिस्तर पर चढ़ जाते हैं और बिना आवाज किए काट लेते हैं।
इसीलिए सरकार ने मानसून से 15 दिन पहले ही तैयारी पूरी कर ली है।
*राष्ट्रीय लक्ष्य के साथ कदम से कदम*
छत्तीसगढ़ की ये पहल केंद्र सरकार की “सर्पदंश विषाक्तता पर राष्ट्रीय कार्ययोजना NAP-SE” का हिस्सा है। इस योजना का लक्ष्य 2030 तक पूरे देश में सर्पदंश से होने वाली मौतों में 50 प्रतिशत की कमी लाना है।
WHO के अनुसार भारत में हर साल लगभग 58 हजार लोगों की मौत सर्पदंश से होती है। छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार इस मामले में टॉप 5 राज्य हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार का मानना है कि अगर समय पर ASV मिल जाए तो 90 प्रतिशत मौतों को रोका जा सकता है। बस जरूरत है सही समय पर अस्पताल पहुंचने की।
*सबसे बड़ी चुनौती: अंधविश्वास*
दवा का स्टॉक तो आ गया, लेकिन डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अभी भी बाकी है। और वो है लोगों की सोच।
स्वास्थ्य विभाग के सर्वे के अनुसार आज भी 40 प्रतिशत से ज्यादा मरीज पहले अस्पताल न जाकर स्थानीय ओझा, गुनिया या तांत्रिक के पास जाते हैं। 2 से 3 घंटे झाड़-फूंक में बर्बाद कर देते हैं। जब हालत बिगड़ती है तब अस्पताल लाते हैं। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
डॉक्टरों का कहना है कि सर्पदंश के बाद “गोल्डन आवर” बहुत जरूरी होता है। काटने के 1 घंटे के अंदर अगर ASV दे दिया जाए तो जान बचने की संभावना 99 प्रतिशत होती है।
इसीलिए अब सरकार के साथ-साथ स्वास्थ्य कार्यकर्ता, मितानिन और पंचायतें गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक कर रही हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि काटने पर पट्टी न बांधें, घाव को न काटें, और तुरंत नजदीकी PHC या 108 एंबुलेंस को फोन करें।
*आम जनता के लिए 5 जरूरी सलाह*
1. घर के आसपास झाड़ियां साफ रखें। कचरा इकट्ठा न होने दें।
2. रात में टॉर्च लेकर चलें और पैरों में जूते पहनें।
3. सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें।
4. काटने पर मरीज को घबराने न दें। उसे लिटा दें और हिलने न दें।
5. तुरंत 108 पर कॉल करें या नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र जाएं।
*निष्कर्ष*
छत्तीसगढ़ सरकार का ये कदम सराहनीय है। दवा का स्टॉक होना आधी लड़ाई जीतने जैसा है। अब जरूरत है कि आम लोग भी जागरूक हों। अंधविश्वास को छोड़कर वैज्ञानिक इलाज पर भरोसा करें।
अगर हर गांव का व्यक्ति ये जान ले कि सर्पदंश का इलाज सिर्फ अस्पताल में है, झाड़-फूंक में नहीं, तो 2030 का लक्ष्य हम आसानी से पा लेंगे।
फिलहाल मानसून आ चुका है। स्वास्थ्य विभाग अलर्ट पर है और 1 लाख शीशियां आपकी सुरक्षा के लिए तैयार हैं।
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