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उत्पादन की समीक्षा पर जोर, लेकिन पौधरोपण और हरित पट्टी की वास्तविक स्थिति का सत्यापन जरूरी; तमनार-घरघोड़ा क्षेत्र में प्रदूषण नियंत्रण और सड़क निर्माण भी चर्चा के केंद्र में
संवाददाता: झसकेतन राजहंस रायगढ़, छत्तीसगढ़।
रायगढ़ जिले में कोयला खनन और औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के बीच पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। खदानों से होने वाले उत्पादन, राजस्व और औद्योगिक गतिविधियों की समीक्षा के साथ-साथ अब यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि खनन के कारण प्रभावित हुए जंगलों की भरपाई, क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण और खदानों के आसपास ग्रीन बेल्ट विकसित करने के लिए निर्धारित शर्तों का कितना पालन हो रहा है।
केलो प्रवाह की 12 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जिले में वर्तमान में 13 कोयला खदानें उत्पादनरत हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि खदानों के उत्पादन की समीक्षा तो होती है, लेकिन ग्रीन बेल्ट के विकास की वास्तविक स्थिति की नियमित और प्रभावी जांच नहीं हो रही है। यदि यह स्थिति सही है, तो यह पर्यावरणीय निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
### खनन के साथ हरित पट्टी विकसित करना क्यों जरूरी?
कोयला खनन के लिए बड़े भूभाग की आवश्यकता होती है। कई स्थानों पर इसके कारण जंगलों, प्राकृतिक वनस्पतियों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव पड़ता है। खनन गतिविधियों से उड़ने वाली धूल, भारी वाहनों की आवाजाही और औद्योगिक प्रदूषण भी आसपास रहने वाले लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों के अनुरूप वृक्षारोपण, क्षतिपूर्ति पौधरोपण और ग्रीन बेल्ट का विकास महत्वपूर्ण हो जाता है। हरित पट्टी केवल कागजों में पौधरोपण दिखाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लगाए गए पौधों का जीवित रहना, उनका नियमित रखरखाव और निर्धारित क्षेत्र में हरियाली का वास्तविक विकास भी उतना ही आवश्यक है।
खदानों के आसपास विकसित की गई हरित पट्टी धूल के प्रसार को कम करने में मदद कर सकती है। हालांकि, इसका प्रभाव पौधों की प्रजाति, घनत्व, चौड़ाई, रखरखाव और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए केवल पौधे लगाने के आंकड़े पर्यावरण संरक्षण की सफलता का पूरा प्रमाण नहीं माने जा सकते।
### तमनार और घरघोड़ा क्षेत्र की निगरानी पर उठे सवाल
रायगढ़ जिले के तमनार और घरघोड़ा क्षेत्र में कोयला खनन तथा औद्योगिक गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय चुनौतियां लंबे समय से सार्वजनिक चर्चा का विषय रही हैं। संबंधित रिपोर्ट में खराब सड़कों, कोयले की धूल और फ्लाई ऐश से जुड़े प्रदूषण के मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन समस्याओं के संबंध में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के समक्ष मामला पहुंचा था। इसके बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल से जुड़ी समितियों की भूमिका भी चर्चा में आई।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि निगरानी समिति ने ग्रीन बेल्ट विकास को प्रगतिरत बताया था, जबकि जमीनी स्तर पर इसकी वास्तविक प्रगति को लेकर सवाल बने हुए हैं। एनजीटी द्वारा समिति की रिपोर्ट में प्रमाणों की कमी पर गंभीर टिप्पणी किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
इन परिस्थितियों में आवश्यक है कि संबंधित क्षेत्रों में हरित पट्टी के विकास की स्थिति का निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित मूल्यांकन कराया जाए। हालांकि, प्रत्येक खदान में ग्रीन बेल्ट की वर्तमान स्थिति और कथित अनुपालन की कमी की पुष्टि के लिए नवीनतम आधिकारिक निरीक्षण रिपोर्ट, स्थल की तस्वीरें, पौधरोपण के आंकड़े और संबंधित आदेशों का परीक्षण जरूरी होगा।
### कई औद्योगिक इकाइयों की भूमिका पर भी चर्चा
प्रकाशित रिपोर्ट में जेपीएल, जेएसपीएल, टीआरएन एनर्जी, महावीर एनर्जी, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, मोनेट इस्पात और एसईसीएल का उल्लेख प्रदूषण से जुड़े मामले के संदर्भ में किया गया है।
इन संस्थानों का उल्लेख संबंधित रिपोर्ट और कार्यवाही के संदर्भ में है। प्रत्येक इकाई की वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति, किसी विशिष्ट उल्लंघन में उसकी जिम्मेदारी और उस पर लागू आदेशों की पुष्टि संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों से अलग-अलग की जानी चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था के लिए जरूरी है कि खदानों और औद्योगिक इकाइयों से संबंधित पर्यावरणीय शर्तों का नियमित निरीक्षण हो। निरीक्षण के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं और जहां कमी मिले, वहां निर्धारित नियमों के अनुसार सुधारात्मक कार्रवाई की जाए।
### CSR और DMF की तरह पर्यावरण संरक्षण की भी हो नियमित समीक्षा
कोयला खनन प्रभावित क्षेत्रों में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR), जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF), उत्पादन और विकास कार्यों को लेकर बैठकें होती रहती हैं। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण के उपायों की समीक्षा को भी समान महत्व दिए जाने की आवश्यकता है।
स्थानीय लोगों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि उनके आसपास की खदानों में कितने पौधे लगाए गए, उनमें से कितने जीवित हैं, ग्रीन बेल्ट के लिए कितना क्षेत्र निर्धारित किया गया और पर्यावरणीय शर्तों के पालन की निगरानी किस अधिकारी या एजेंसी द्वारा की जा रही है।
एक प्रभावी निगरानी व्यवस्था में निम्नलिखित बिंदुओं को प्राथमिकता दी जा सकती है:
* ग्रीन बेल्ट का सत्यापन: स्वीकृत योजना के अनुसार निर्धारित क्षेत्र में हरित पट्टी विकसित हुई या नहीं।
* पौधों की वास्तविक स्थिति: लगाए गए पौधों की संख्या के साथ उनके जीवित रहने और बढ़ने का आकलन।
* वायु गुणवत्ता की जांच: कोयले की धूल और अन्य प्रदूषकों के स्तर की नियमित निगरानी।
* क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण: निर्धारित शर्तों के अनुसार पौधरोपण और उसके रखरखाव की जांच।
* सार्वजनिक जवाबदेही: निरीक्षण रिपोर्ट, कमियों और सुधारात्मक कार्रवाई की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाना।
यदि इन बिंदुओं पर नियमित समीक्षा की जाए, तो पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन की स्थिति अधिक पारदर्शी हो सकती है।
### वर्ष 2021 के सड़क निर्माण आदेश का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
रिपोर्ट में एनजीटी के वर्ष 2021 के एक आदेश का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, तमनार-घरघोड़ा क्षेत्र में सड़क निर्माण के लिए 335 करोड़ रुपये की स्वीकृति से संबंधित निर्देश दिए गए थे।
रिपोर्ट में रायगढ़ से धरमजयगढ़ तक 76 किलोमीटर तथा पूंजीपथरा से मिलूपारा तक 35 किलोमीटर सड़क निर्माण का उल्लेख है। इन दोनों हिस्सों की कुल लंबाई 111 किलोमीटर बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, सात मीटर चौड़ी सड़क के निर्माण और प्रति किलोमीटर लगभग तीन करोड़ रुपये की लागत के आधार पर मार्च 2021 तक आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था। रिपोर्ट में इसके क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि, वर्तमान में सड़क निर्माण की वास्तविक स्थिति, स्वीकृत राशि, व्यय और आदेश के अनुपालन की पुष्टि के लिए संबंधित विभागों के नवीनतम अभिलेखों तथा एनजीटी के मूल आदेश का परीक्षण आवश्यक है।
### अब प्रशासन और संबंधित विभागों से क्या अपेक्षा है?
रायगढ़ जिले में खनन और औद्योगिक गतिविधियां आर्थिक विकास, रोजगार तथा राजस्व से जुड़ी हुई हैं। लेकिन इन गतिविधियों के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है। विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना जरूरी है।
जिला प्रशासन, पर्यावरण संरक्षण मंडल, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित खनन कंपनियों को चाहिए कि वे पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों के पालन की वास्तविक स्थिति सामने लाएं। यदि किसी क्षेत्र में ग्रीन बेल्ट का विकास अधूरा है, तो उसके लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए। जहां नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण से जुड़े संगठनों के लिए भी यह विषय महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध स्वच्छ हवा, हरियाली, सड़क सुरक्षा और क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जीवन की गुणवत्ता से है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि खनन से प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण के लिए निर्धारित उपायों की निगरानी कितनी प्रभावी है और उनके वास्तविक परिणामों का सार्वजनिक सत्यापन कब होगा?
रायगढ़ के तमनार, घरघोड़ा और अन्य खनन प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण की स्थिति स्पष्ट करने के लिए पारदर्शी निरीक्षण, प्रमाण-आधारित रिपोर्ट और समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं।
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संवाददाता: झसकेतन राजहंस | रायगढ़, छत्तीसगढ़




















