सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद छत्तीसगढ़ में नगरीय निकायों को कार्रवाई के निर्देश, गाय-बैल-भैंस समेत मवेशियों की होगी 12 अंकों की डिजिटल कान टैगिंग
ग्रामीण भारत न्यूज | संवाददाता — झसकेतन राजहंस
रायपुर/बिलासपुर, 4 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक सड़कों और रास्तों पर खुले में घूमने वाले मवेशियों की समस्या को लेकर नगरीय प्रशासन ने कार्रवाई तेज करने के निर्देश दिए हैं। सड़क पर घूमते मवेशियों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने और पशु मालिकों की जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से अब नगरीय क्षेत्रों में पशुओं की पहचान और रिकॉर्ड को डिजिटल व्यवस्था से जोड़ा जाएगा।
नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने राज्य के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों को इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। व्यवस्था के तहत नगरीय सीमा में पाले जाने वाले तथा व्यावसायिक उपयोग में आने वाले गाय, बैल, भैंस सहित अन्य संबंधित मवेशियों की 12 अंकों की डिजिटल कान टैगिंग की जाएगी। टैग से संबंधित जानकारी पशु उत्पादकता एवं स्वास्थ्य सूचना नेटवर्क में दर्ज किए जाने की व्यवस्था बताई गई है।
इस डिजिटल रिकॉर्ड का उद्देश्य यह पता लगाना है कि सड़क या सार्वजनिक मार्ग पर पाया गया मवेशी किस व्यक्ति का है। यदि किसी पशु को सड़क पर लावारिस हालत में पाया जाता है और उसकी पहचान डिजिटल रिकॉर्ड के माध्यम से हो जाती है, तो संबंधित पशु मालिक तक पहुंचने में प्रशासन को मदद मिलेगी।
सड़क पर पशु मिलने पर होगी कार्रवाई
सार्वजनिक सड़कों पर मवेशियों के विचरण को सड़क सुरक्षा से जुड़ी गंभीर समस्या माना जा रहा है। रात के समय या कम रोशनी वाले क्षेत्रों में सड़क पर बैठे या चलते मवेशियों के कारण वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
नई व्यवस्था में नगर निकायों को ऐसे मवेशियों की धरपकड़ और उनके सुरक्षित आश्रय तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई है। कार्रवाई के दौरान आवश्यकता पड़ने पर नगर सेना और स्थानीय पुलिस का सहयोग भी लिया जा सकेगा।
पशु मालिक की पहचान होने के बाद नियमानुसार जुर्माना अथवा अन्य दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य केवल पशुओं को पकड़ना नहीं बल्कि उनके मालिकों की जिम्मेदारी भी निर्धारित करना है।
हर नगरीय निकाय में नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी
निर्देशों के अनुसार नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत स्तर पर एक जिम्मेदार अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाया जाएगा। नोडल अधिकारी के माध्यम से पशुओं की टैगिंग, सड़क पर घूमने वाले मवेशियों की धरपकड़, पशु आश्रय स्थलों की निगरानी तथा संबंधित कार्रवाई की जानकारी का रिकॉर्ड रखा जाएगा।
नगरीय निकायों को अपने क्षेत्र में यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पकड़े गए मवेशियों को उचित व्यवस्था के तहत गौशाला, कांजी हाउस या पंजीकृत पशु आश्रय स्थल में सुरक्षित पहुंचाया जाए।
डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज होगी पूरी जानकारी
पशुओं की डिजिटल टैगिंग इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। टैग के माध्यम से पशु की पहचान से संबंधित जानकारी डिजिटल डाटाबेस में उपलब्ध रहेगी। इससे प्रशासन को पशु के मालिक की पहचान करने में सुविधा होगी।
किसी पशु को सड़क से पकड़कर आश्रय स्थल पहुंचाए जाने के बाद उसकी सुपुर्दगी और संबंधित कार्रवाई की जानकारी भी डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज करने की व्यवस्था होगी। पशु मालिक को सुपुर्दगी के समय रसीद उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी अपनाई जाएगी।
इस व्यवस्था से भविष्य में यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि कोई पशु बार-बार सार्वजनिक मार्ग पर छोड़ा जा रहा है या नहीं।
वृद्ध और अनुपयोगी मवेशियों पर भी नजर
नगरीय सीमा में बड़ी संख्या में ऐसे पशु भी पाए जाते हैं जिन्हें उनके मालिक उम्र बढ़ने या उपयोगिता कम होने के बाद खुले में छोड़ देते हैं। ऐसे पशुओं के कारण सड़क और सार्वजनिक स्थानों पर समस्या उत्पन्न होती है।
निर्देशों के अनुसार वृद्ध अथवा अनुपयोगी मवेशियों को सड़क पर छोड़ने के बजाय सुरक्षित आश्रय व्यवस्था तक पहुंचाने पर जोर दिया गया है। नगर निकायों को अपने क्षेत्र में उपलब्ध गौशालाओं, कांजी हाउस तथा अन्य पंजीकृत पशु आश्रय स्थलों की निगरानी भी करनी होगी।
इससे एक तरफ सड़क पर आवारा मवेशियों की संख्या नियंत्रित करने में मदद मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ पशुओं के लिए सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी संबंधित संस्थाओं पर रहेगी।
रोजाना निगरानी और रिपोर्टिंग पर जोर
नगरीय निकायों को केवल अभियान चलाकर कार्रवाई समाप्त नहीं करनी होगी। संबंधित अधिकारियों को पशु आश्रय स्थलों और सड़क पर घूमने वाले मवेशियों की स्थिति पर नियमित नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं।
कार्रवाई की प्रगति की रिपोर्ट संचालनालय को भेजने की व्यवस्था भी बताई गई है। इससे राज्य स्तर पर यह देखा जा सकेगा कि अलग-अलग नगरीय निकायों में पशु टैगिंग, धरपकड़ और आश्रय व्यवस्था को लेकर कितना काम हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बढ़ी सक्रियता
मवेशियों के कारण सड़क दुर्घटनाओं और पशु मालिकों की जवाबदेही से जुड़े मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के 31 जुलाई 2026 के निर्णय के बाद यह विषय और महत्वपूर्ण हो गया है। दिए गए समाचार के अनुसार मामला निशा बनाम म्युनिसिपल काउंसिल संगरूर से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सड़क पर मवेशियों के कारण हुई दुर्घटना से संबंधित मामले में पीड़ित परिवार को राहत प्रदान की गई थी। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए एकमुश्त 15 लाख रुपये की राशि देने का आदेश दिया था। हालांकि यह राशि संबंधित मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर थी और इसे प्रत्येक सड़क दुर्घटना के लिए सामान्य मुआवजे की दर नहीं माना गया।
इस मामले से सड़क सुरक्षा, पशु मालिकों की जिम्मेदारी और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान गया।
मुआवजा व्यवस्था पर भी विचार
सुप्रीम कोर्ट की ओर से सड़क दुर्घटनाओं में मवेशियों की मौजूदगी से उत्पन्न परिस्थितियों और पीड़ितों को राहत देने की व्यवस्था पर भी विचार का विषय सामने आया है।
इसके साथ ही पशुओं की पहचान के लिए टैगिंग और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने, अनुपयोगी मवेशियों को सुरक्षित आश्रय में पहुंचाने तथा पशु मालिकों की जवाबदेही तय करने जैसे मुद्दों पर भी जोर दिया गया।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक निर्णय की जानकारी पहुंचाए जाने के बाद अब विभिन्न राज्यों में स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाओं को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
पशु मालिकों के लिए क्या बदलेगा?
नई व्यवस्था लागू होने के बाद नगरीय क्षेत्रों में पशु पालने वाले लोगों के लिए पशुओं की पहचान और रिकॉर्ड संबंधी व्यवस्था अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
यदि पशु की डिजिटल टैगिंग हो चुकी है और वह सार्वजनिक सड़क पर पाया जाता है तो डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर मालिक तक पहुंचना प्रशासन के लिए आसान होगा। इसके बाद संबंधित नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
इसका सीधा संदेश यह है कि पशु पालने वाले लोगों को अपने मवेशियों की जिम्मेदारी स्वयं उठानी होगी। पशु को सार्वजनिक सड़क पर छोड़ देने के बाद होने वाली समस्या की जिम्मेदारी से बचना पहले की तुलना में कठिन हो सकता है।
सड़क सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम
छत्तीसगढ़ के नगरीय क्षेत्रों में सड़क पर घूमने वाले मवेशियों की समस्या लंबे समय से वाहन चालकों और स्थानीय प्रशासन के लिए चुनौती रही है। विशेष रूप से रात के समय सड़कों पर बैठे मवेशियों को वाहन चालकों द्वारा समय पर देख पाना कठिन होता है।
ऐसे में डिजिटल पहचान, नियमित धरपकड़, सुरक्षित आश्रय और मालिक की जवाबदेही को एक ही व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
हालांकि व्यवस्था की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नगरीय निकायों में टैगिंग कितनी व्यापक रूप से होती है, डिजिटल रिकॉर्ड कितना अद्यतन रखा जाता है, पकड़े गए पशुओं के लिए पर्याप्त आश्रय उपलब्ध हैं या नहीं तथा नियमों का पालन और कार्रवाई किस तरह की जाती है।
प्रशासन और पशु मालिक दोनों की जिम्मेदारी
इस पूरी व्यवस्था में केवल पशु मालिक ही जिम्मेदार पक्ष नहीं हैं। नगर निकायों को भी सड़क से मवेशियों की नियमित धरपकड़, उनकी सुरक्षित व्यवस्था, गौशाला एवं आश्रय स्थलों की निगरानी तथा रिकॉर्ड अपडेट करने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
यदि पशु सड़क पर पाया जाता है तो पहले उसकी पहचान और सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी होगा। वहीं मालिक की पहचान होने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
इस प्रकार नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सड़क पर मवेशियों की समस्या को केवल अस्थायी रूप से हटाना नहीं बल्कि पशु की पहचान, मालिक की जवाबदेही, सुरक्षित आश्रय और प्रशासनिक निगरानी को एक डिजिटल प्रणाली से जोड़ना है।
ग्रामीण भारत न्यूज की अपील
सड़क सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। पशु पालकों को भी अपने मवेशियों को खुले में सड़क पर छोड़ने से बचना चाहिए। वाहन चालकों को भी विशेषकर रात और ग्रामीण-नगरीय संपर्क मार्गों पर सावधानी से वाहन चलाना चाहिए।
प्रशासन द्वारा डिजिटल टैगिंग और रिकॉर्ड व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो इससे सड़क पर आवारा मवेशियों की समस्या पर निगरानी मजबूत हो सकती है और दुर्घटनाओं की रोकथाम की दिशा में सहायता मिल सकती है।
ग्रामीण भारत न्यूज | संवाददाता — झसकेतन राजहंस




















