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ग्रामीण भारत न्यूज विशेष रिपोर्ट: जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र के बदल जाएंगे नियम, बिना चर्चा के ही लोकसभा में पास हो गया विधेयक

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Bureau Report

न्यू दिल्ली -31/07/2026

​सांसद के मानसून सत्र से एक बहुत बड़ी और आम आदमी के जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाली खबर सामने आ रही है। शुक्रवार को लोकसभा में जन्म और मृत्यु पंजीकरण से संबंधित एक बेहद महत्वपूर्ण विधेयक बिना किसी विस्तृत चर्चा के, भारी हंगामे और शोरगुल के बीच ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। यह विधेयक हमारे देश के प्रत्येक नागरिक, विशेषकर ग्रामीण भारत के उन करोड़ों लोगों के लिए बहुत मायने रखता है, जिनके लिए सरकारी दस्तावेजों को बनवाना आज भी एक जटिल और लंबी प्रक्रिया साबित होती है। इस नए कानून के लागू होने के बाद जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव आने वाले हैं। खासकर उन लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जो किसी कारणवश जन्म या मृत्यु की सूचना समय पर नहीं दे पाते हैं और पंजीकरण में देरी हो जाती है। नए विधेयक में देरी से होने वाले पंजीकरण के खिलाफ नियमों को अत्यधिक सख्त कर दिया गया है।

​लोकसभा की कार्यवाही और विपक्ष का हंगामा

लोकसभा ने शुक्रवार को जन्म और मृत्यु के पंजीकरण संबंधी कानून में संशोधन करने के प्रावधान वाले इस अति महत्वपूर्ण विधेयक को विपक्षी दलों के सदस्यों के भारी हंगामे के बीच बिना किसी सार्थक चर्चा के ही पारित कर दिया। ज्ञात हो कि राज्यसभा में बीते उनतीस जुलाई को ही यह विधेयक पारित किया जा चुका था। अब लोकसभा से भी इसे मंजूरी मिल गई है, जिसका सीधा अर्थ है कि जल्द ही यह राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून का रूप ले लेगा। सदन में जब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जन्म और मृत्यु का पंजीकरण संशोधन विधेयक दो हजार छब्बीस को पारित करने के लिए पेश किया, तो उस समय सदन का माहौल बेहद तनावपूर्ण था।

​विपक्षी दलों के सदस्य अपनी मांगों और विरोध को लेकर लगातार नारेबाजी कर रहे थे। विपक्ष का यह हंगामा मुख्य रूप से दो बड़े मुद्दों को लेकर था। पहला मुद्दा दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस की कथित कठोर कार्रवाई से जुड़ा था, जिसे लेकर विपक्षी सांसद सरकार से जवाब मांग रहे थे। वहीं, दूसरा मुद्दा राम मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी के मामले से संबंधित था। इन दोनों विषयों पर विपक्षी सांसद सदन के बीचों-बीच आकर लगातार नारेबाजी कर रहे थे और सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। इस भारी शोरगुल और अव्यवस्था के बीच, विधेयक के तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं पर कोई चर्चा नहीं हो सकी।

​बिना चर्चा के ध्वनिमत से पारित हुआ विधेयक

लोकतंत्र में संसद का मूल उद्देश्य ही यह है कि किसी भी कानून को बनाने से पहले उस पर पक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से विस्तृत विचार-विमर्श हो, उसके हर एक पहलू को परखा जाए और आम जनता पर पड़ने वाले उसके प्रभावों का आकलन किया जाए। लेकिन इस विधेयक के मामले में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। सदन ने बिना किसी चर्चा के, केवल ध्वनिमत से इस विधेयक को पारित कर दिया। स्थिति यह थी कि विपक्षी सदस्यों ने इस विधेयक पर अपने कोई संशोधन भी पेश नहीं किए।

​इस विधेयक की पृष्ठभूमि की बात करें तो बीते बीस जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस संशोधन विधेयक को अपनी औपचारिक मंजूरी प्रदान की थी। इसके बाद इसे उनतीस जुलाई को उच्च सदन यानी राज्यसभा में पेश किया गया और वहां से पारित कराया गया। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, उन्नीस सौ उनहत्तर की धारा तेरह के उपखंड तीन में और अधिक संशोधन करना है। याद रहे कि इस अधिनियम में पिछले वर्ष यानी दो हजार तेईस में भी संशोधन किए गए थे। अब एक बार फिर से इसमें बदलाव किया जा रहा है, ताकि विलंब से होने वाले जन्म और मृत्यु पंजीकरण के प्रावधानों को और अधिक कड़ा, पारदर्शी और व्यवस्थित बनाया जा सके।

​नियमों में क्या होगा बदलाव और आम आदमी पर इसका असर

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस नए विधेयक के पारित होने के बाद आम जनता के लिए नियमों में क्या बुनियादी बदलाव होने जा रहे हैं। मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत, यदि किसी बच्चे के जन्म या किसी व्यक्ति की मृत्यु का पंजीकरण एक वर्ष से अधिक की देरी से कराया जाता है, तो इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट अथवा किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए काफी जटिल रही है, क्योंकि सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना और मजिस्ट्रेट से आदेश प्राप्त करना आम आदमी के लिए आसान नहीं होता।

​नए विधेयक में इस प्रक्रिया को और भी अधिक सख्त कर दिया गया है। विधेयक में देरी की अवधि के आधार पर अब दो-स्तरीय मंजूरी व्यवस्था का प्रावधान किया गया है। इसका मतलब यह है कि पंजीकरण में जितनी ज्यादा देरी होगी, मंजूरी लेने की प्रक्रिया उतनी ही उच्च स्तर पर जाएगी और उतनी ही जटिल होगी। सरकार का तर्क है कि इस नए कानून के जरिए जन्म और मृत्यु से जुड़े पूरे रिकॉर्ड को पूरी तरह से डिजिटल और ज्यादा व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही, फर्जी दस्तावेजों के सहारे गलत तरीके से लाभ उठाने या नागरिकता संबंधी फर्जीवाड़ा करने वालों पर भी प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।

​सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून के लागू होने के बाद जन्म प्रमाणपत्र केवल एक साधारण दस्तावेज नहीं रह जाएगा, बल्कि इसे तमाम सरकारी सेवाओं, सुविधाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में प्रमुख और अनिवार्य दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया जाएगा। चाहे स्कूल या कॉलेज में प्रवेश लेना हो, मतदाता सूची में नाम जुड़वाना हो, आधार कार्ड बनवाना हो, विवाह का पंजीकरण कराना हो, या फिर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करना हो, हर जगह जन्म प्रमाणपत्र ही सबसे प्रामाणिक दस्तावेज माना जाएगा। नया कानून लागू होने के बाद यह हर नागरिक के लिए सबसे जरूरी दस्तावेज बन जाएगा, जिसके बिना कई महत्वपूर्ण कार्य बाधित हो सकते हैं।

​ग्रामीण भारत पर इस कानून का सीधा प्रभाव

ग्रामीण भारत न्यूज के दर्शकों और पाठकों के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि इस कानून का देश के गांवों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। ग्रामीण भारत में आज भी जागरूकता का भारी अभाव है। शिक्षा की कमी, संसाधनों की अनुपलब्धता और सरकारी दफ्तरों से दूरी के कारण गांवों में जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अक्सर समय पर नहीं हो पाता है। कई बार लोग सोचते हैं कि जब बच्चे का स्कूल में दाखिला कराना होगा, तब एक साथ प्रमाणपत्र बनवा लेंगे। इसी तरह, मृत्यु के मामले में भी यदि कोई संपत्ति का विवाद या बीमा का क्लेम नहीं होता है, तो ग्रामीण लोग मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाते हैं और महीनों, कभी-कभी तो सालों तक पंजीकरण लंबित रहता है।

​अब नए कानून के आने के बाद इस तरह की लापरवाही या देरी भारी पड़ सकती है। यदि ग्रामीण समय सीमा के भीतर पंजीकरण नहीं कराते हैं, तो उन्हें दो-स्तरीय मंजूरी व्यवस्था के तहत और भी अधिक जटिल सरकारी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। एसडीएम या डीएम कार्यालय के बार-बार चक्कर लगाने पड़ सकते हैं, जो एक गरीब किसान या मजदूर के लिए समय और धन दोनों की बर्बादी का कारण बनेगा। इसलिए, यह बहुत जरूरी है कि सरकार इस कानून को लागू करने के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर, पंचायतों के माध्यम से व्यापक जागरूकता अभियान चलाए। लोगों को यह बताया जाए कि जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अब केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उनके और उनके बच्चों के भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आवश्यकता बन गई है।

​डिजिटलीकरण की ओर बढ़ता कदम और चुनौतियां

सरकार का कहना है कि यह विधेयक जन्म और मृत्यु के आंकड़ों को पूरी तरह से डिजिटल करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। डिजिटलीकरण से निश्चित तौर पर व्यवस्था में पारदर्शिता आती है और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता है। जब सभी रिकॉर्ड डिजिटल हो जाएंगे, तो किसी भी व्यक्ति के लिए फर्जी जन्म प्रमाणपत्र या मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाना लगभग असंभव हो जाएगा। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सटीक जनसंख्या आंकड़ों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। सटीक आंकड़ों से सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, और अन्य कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर ढंग से बनाने और लागू करने में मदद मिलेगी।

​लेकिन, इसके साथ ही ग्रामीण भारत में डिजिटलीकरण की अपनी अलग चुनौतियां हैं। इंटरनेट की धीमी गति, बिजली की कटौती, और कंप्यूटर साक्षरता की कमी के कारण अक्सर ग्रामीण इलाकों में डिजिटल सेवाएं बाधित रहती हैं। पंचायत स्तर पर काम करने वाले कई कर्मचारियों को अभी भी तकनीकी रूप से पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं किया जा सका है। ऐसे में यदि पंजीकरण की पूरी प्रक्रिया को सख्ती से डिजिटल और समयबद्ध कर दिया जाता है, तो तकनीकी खामियों के कारण भी ग्रामीणों को देरी का सामना करना पड़ सकता है, जिसका दंड उन्हें कड़े नियमों के रूप में भुगतना पड़ेगा। इसलिए, सिस्टम को सख्त बनाने के साथ-साथ बुनियादी ढांचे को भी मजबूत करना होगा।

​संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप

इस विधेयक के पारित होने के बाद संसद के भीतर और बाहर भारी राजनीतिक बयानबाजी भी देखने को मिली। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने विपक्ष के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक देश के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार चाहती थी कि सदन के सभी सदस्य इस पर होने वाली चर्चा में भाग लें। रीजीजू ने कहा कि सरकार की ओर से बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद विपक्ष के साथियों ने अपनी राजनीतिक जिद के कारण विधेयक पर चर्चा में भाग नहीं लिया।

​संसदीय कार्य मंत्री ने तल्ख लहजे में कहा कि अब विपक्ष को सदन से बाहर जाकर जनता या मीडिया के सामने यह रोना नहीं रोना चाहिए कि सरकार ने बिना चर्चा के विधेयक कैसे पारित करा लिया। रीजीजू ने कहा, यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। देश की जनता आपसे जवाब मांगेगी कि जब इतने महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही थी, तब आप हंगामा क्यों कर रहे थे। अब आप बाहर जाकर यह आरोप नहीं लगा सकते कि बिना चर्चा के विधेयक पारित कराया गया है, क्योंकि आपने खुद ही अपने लोकतांत्रिक कर्तव्य को निभाने का अवसर गंवा दिया है। उन्होंने विपक्ष से यह भी आग्रह किया कि सदन में आगे आने वाले अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों पर वे सकारात्मक सहयोग करें और संसदीय चर्चा में भाग लें।

​पीठासीन सभापति की टिप्पणी

सदन की कार्यवाही के दौरान पीठासीन सभापति दिलीप सैकिया ने भी हंगामा कर रहे विपक्षी सदस्यों को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने विपक्ष के साथियों से कहा कि जब कार्य मंत्रणा समिति की बैठक हुई थी, तब सभी दलों ने यह सहमति जताई थी और विधेयक पर सहयोग करने की बात कही थी। लेकिन जब सदन में विधेयक पेश किया गया, तो आप लोग अपने वादे से मुकर गए और अनावश्यक हंगामा कर रहे हैं। सभापति सैकिया ने स्पष्ट किया कि आपके सहयोग के बिना ही सरकार को यह विधेयक पारित करना पड़ा, जो संसदीय लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ परंपरा नहीं है। यह बिल्कुल भी सही नहीं है कि अहम विधेयकों को शोरगुल के बीच पास कराना पड़े। इसके बावजूद जब विपक्ष का हंगामा नहीं थमा और नारेबाजी लगातार जारी रही, तो स्थिति को देखते हुए सभापति सैकिया ने लोकसभा की कार्यवाही को दिनभर के लिए स्थगित कर दिया।

​क्या कहते हैं विशेषज्ञ

कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि जन्म और मृत्यु पंजीकरण को सख्त बनाना समय की मांग है। कई बार देखा गया है कि लोग उम्र में हेरफेर करने के लिए, सरकारी नौकरी में अधिक समय तक बने रहने के लिए, या बाल विवाह जैसे अपराधों को छिपाने के लिए जन्म की तारीखों को गलत तरीके से पंजीकृत कराते हैं। इसी प्रकार, पारिवारिक संपत्ति के विवादों में फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल आम बात हो गई है। ऐसे में यदि पंजीकरण के नियमों को सख्त किया जाता है और देरी से होने वाले पंजीकरण की गहन जांच के लिए दो-स्तरीय व्यवस्था लागू की जाती है, तो इन सभी फर्जीवाड़ों पर काफी हद तक रोक लग सकेगी।

​हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कोई भी कानून तभी सफल होता है जब उसे लागू करने वाली मशीनरी संवेदनशील हो। यदि निचले स्तर के अधिकारी और कर्मचारी इस नए सख्त कानून का इस्तेमाल आम जनता को डराने या उनसे रिश्वत वसूलने के लिए करने लगेंगे, तो इस संशोधन का पूरा उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। खासतौर पर उन गरीब और अनपढ़ लोगों को बचाना होगा, जो सचमुच किन्हीं प्राकृतिक या पारिवारिक कारणों से समय पर पंजीकरण नहीं करा पाते हैं। मजिस्ट्रेट स्तर की जांच को पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा, ताकि असली आवेदकों को महीनों तक दफ्तरों के बाहर इंतजार न करना पड़े।

​फर्जी दस्तावेजों पर लगेगी लगाम

विधेयक का एक बड़ा पहलू राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकता से भी जुड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां अवैध रूप से देश में रहने वाले विदेशी नागरिकों ने फर्जी तरीके से भारतीय जन्म प्रमाणपत्र हासिल कर लिए और उसके आधार पर आधार कार्ड, पैन कार्ड और पासपोर्ट तक बनवा लिए। जन्म प्रमाणपत्र चूंकि नागरिकता साबित करने का एक अहम दस्तावेज बन जाता है, इसलिए इसकी प्रामाणिकता सबसे ज्यादा जरूरी है। देरी से पंजीकरण के पुराने नियमों में कुछ खामियां थीं, जिनका फायदा उठाकर ऐसे फर्जी दस्तावेज तैयार कर लिए जाते थे।

​नए संशोधन के बाद, जब कोई व्यक्ति कई वर्षों बाद अपने या अपने बच्चे के जन्म का पंजीकरण कराने जाएगा, तो उसे दो-स्तरीय जांच से गुजरना होगा। अधिकारियों को यह अधिकार होगा कि वे देरी के कारण की गहराई से पड़ताल करें, स्थानीय स्तर पर गवाहों और सबूतों की जांच करें और पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही पंजीकरण की अनुमति दें। इससे देश के सिस्टम में अवैध रूप से सेंध लगाने वालों को रोका जा सकेगा।

​भविष्य का रास्ता

जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक का पास होना भारत के प्रशासनिक ढांचे को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जन्म प्रमाणपत्र को प्रमुख दस्तावेज घोषित करने से नागरिकों को अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग दस्तावेज जुटाने की झंझट से मुक्ति मिलेगी। यह वन नेशन वन डॉक्यूमेंट की दिशा में एक बड़ा प्रयास है। लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आम जनता, खासकर ग्रामीण भारत के लोग, इस बदलाव के कारण परेशान न हों।

​पंचायती राज संस्थाओं, आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और ग्राम प्रधानों को इस नए कानून के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें यह जिम्मेदारी दी जानी चाहिए कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में होने वाले हर जन्म और मृत्यु की सूचना तुरंत संबंधित रजिस्ट्रार को दें, ताकि देरी का सवाल ही पैदा न हो। यदि सूचना तंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत कर दिया जाए, तो आम आदमी को कभी भी विलंब शुल्क या मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

​निष्कर्ष

अंत में यही कहा जा सकता है कि कानून में बदलाव बदलाव के लिए नहीं, बल्कि बेहतरी के लिए होने चाहिए। बिना चर्चा के कानून पास होना भले ही राजनीतिक बहस का मुद्दा हो, लेकिन अब जब यह विधेयक पारित हो चुका है, तो इसका अनुपालन देश के हर नागरिक को करना होगा। हम सभी को जागरूक होना पड़ेगा और अपने आसपास के लोगों को भी जागरूक करना होगा कि जन्म और मृत्यु का पंजीकरण समय रहते करवा लें। इसी में हम सबकी भलाई है और यही एक सशक्त और व्यवस्थित देश के निर्माण का रास्ता है। ग्रामीण भारत न्यूज आगे भी आपको ऐसे सभी महत्वपूर्ण सरकारी फैसलों और कानूनों की बारीकी से जानकारी देता रहेगा, जो आपके जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। सही जानकारी ही बचाव है, इसलिए जागरूक रहें और अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत रहें।

​संवाददाता विनोद चौहान

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