जशपुर, छत्तीसगढ़। सरकारी व्यवस्था की लापरवाही और ग्रामीण शिक्षा की बदहाली की एक तस्वीर इन दिनों जशपुर जिले से सामने आई है। यहां पत्थलगांव विकासखंड के ग्राम पंचायत जामजूनवानी के आश्रित ग्राम नरवाटिकरा में स्थित शासकीय प्राथमिक शाला में शिक्षा सत्र 2026-27 में एक भी बच्चे का नामांकन नहीं हुआ है। हैरानी की बात यह है कि स्कूल में छात्र तो नहीं हैं, लेकिन स्कूल रोज खुल रहा है। ताला खुल रहा है, घंटी बज रही है, शिक्षक हाजिरी लगा रहे हैं और सरकारी फंड भी खर्च हो रहा है।
जब मीडिया की टीम स्कूल पहुंची तो परिसर पूरी तरह वीरान मिला। कमरों में धूल जमी किताबें, बस्ते और खेल का सामान रखा था। स्कूल के गेट पर सिर्फ एक पालतू कुत्ता बैठा था। मानो वही इस स्कूल का एकलौता विद्यार्थी हो।
शून्य से शुरू हुआ सफर, अब शून्य पर आकर रुका
नरवाटिकरा प्राथमिक शाला की कहानी पिछले 4 साल में पूरी तरह बदल गई।
वर्ष 2022 में इस स्कूल में 15 बच्चे पढ़ते थे। 2023 में संख्या घटकर 12 रह गई। 2024 में भी 12 बच्चे थे। 2025 में सिर्फ 7 बच्चे बचे और अब 2026 में एक भी बच्चा नहीं बचा।
ग्रामवासियों का कहना है कि धीरे-धीरे अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूल से उठ गया। जिनके पास थोड़ी हैसियत है वे अपने बच्चों को पत्थलगांव और जशपुर के निजी स्कूलों में भेजने लगे। गरीब परिवारों के बच्चे या तो मजदूरी में लग गए या फिर स्कूल छोड़ दिया।
स्कूल में कौन-कौन पदस्थ
शून्य छात्र होने के बावजूद इस स्कूल में पूरा स्टाफ आज भी पदस्थ है।
स्कूल में प्रधान पाठक राजाराम एक्का पदस्थ हैं। वे रोज समय पर स्कूल आते हैं और रजिस्टर में हाजिरी लगाते हैं।
सहायक शिक्षक फिलमोन लकड़ा भी इस स्कूल में पदस्थ हैं। मीडिया टीम के पहुंचने पर वे बिना सूचना के अनुपस्थित पाए गए।
इसके अलावा स्कूल में दो रसोइया और एक सफाई कर्मी भी पदस्थ हैं। छात्र नहीं होने के कारण रसोइए स्कूल नहीं आते। सफाई कर्मी सुबह आकर झाड़ू लगाकर चले जाते हैं।
मतलब एक भी बच्चे के लिए 1 प्रधान पाठक, 1 सहायक शिक्षक, 2 रसोइया और 1 सफाई कर्मी। कुल 5 लोगों का वेतन सरकार दे रही है।
किताबें और संसाधन धूल खा रहे
स्कूल के अंदर का नजारा देखकर मन दुखी हो जाता है। अलमारी में नई-नई किताबें बंद हैं। खेल का सामान, स्मार्ट क्लास का सामान, मिड डे मील के बर्तन सब रखे हैं। लेकिन इस्तेमाल करने वाला कोई नहीं है।
दीवारों पर “स्वच्छ भारत” और “पढ़ेगा इंडिया तभी बढ़ेगा इंडिया” के पोस्टर लगे हैं। लेकिन क्लासरूम में सन्नाटा है। ब्लैकबोर्ड पर पिछले साल का चॉक का निशान अभी तक मिटा नहीं है।
अभिभावक क्यों नहीं भेज रहे बच्चे
गांव के लोगों से बात करने पर असली वजह सामने आई।
पहला कारण: बस्ती में स्कूली उम्र के बच्चे ही नहीं बचे। जो 2-4 बच्चे हैं उनके माता-पिता उन्हें 10 किलोमीटर दूर पत्थलगांव के अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भेज रहे हैं। उनका मानना है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं होती और भविष्य खराब हो जाएगा।
दूसरा कारण: स्कूल की बिल्डिंग पुरानी है। शौचालय की हालत खराब है। शिक्षकों की कमी के कारण एक ही शिक्षक को 5 क्लास संभालनी पड़ती थी।
प्रधान पाठक राजाराम एक्का ने बताया कि उन्होंने कई बार अभिभावकों के घर जाकर बच्चों को स्कूल लाने का प्रयास किया। पंचायत से भी मदद मांगी। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। लोग कहते हैं साहब सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं होती।
विभाग को कब पता चला
संकुल समन्वयक ने बताया कि शून्य नामांकन की रिपोर्ट अप्रैल में ही बीईओ और बीआरसी कार्यालय को भेज दी गई थी। शिक्षा विभाग ने जिले के ऐसे सभी स्कूलों की सूची बनाई है जहां 10 से कम बच्चे हैं। उस सूची में नरवाटिकरा का नाम सबसे ऊपर है।
अब विभाग ने प्रस्ताव तैयार किया है।
प्रशासन का प्रस्ताव: समायोजन और स्थानांतरण
पत्थलगांव के बीईओ वेदानंद आर्य ने बताया कि नरवाटिकरा स्कूल में पदस्थ दोनों शिक्षकों के समायोजन और स्कूल को दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव कलेक्टर जशपुर को भेज दिया गया है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि राजाराम एक्का और फिलमोन लकड़ा को उन स्कूलों में भेजा जाए जहां शिक्षकों की कमी है। स्कूल भवन को आंगनबाड़ी या पंचायत भवन में बदलने पर विचार किया जा सकता है।
अब अंतिम फैसला कलेक्टर के स्तर पर होगा। तब तक स्कूल रोज खुलेगा और शिक्षक हाजिरी देंगे।
एक तरफ कमी, दूसरी तरफ फालतू
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जशपुर जिले के कई सरकारी स्कूल आज भी एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। वहां 80-90 बच्चे हैं लेकिन पढ़ाने वाला सिर्फ एक गुरुजी। वहीं दूसरी तरफ नरवाटिकरा जैसे स्कूल में एक भी बच्चा नहीं और 5 लोग वेतन ले रहे हैं।
शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यह सिस्टम की सबसे बड़ी खामी है। समय पर युक्तियुक्तकरण नहीं होता। जब तक कोई स्कूल पूरी तरह बंद नहीं होता तब तक स्टाफ को हटाया नहीं जाता।
ग्रामीणों की प्रतिक्रिया
गांव के बुजुर्ग रामसाय यादव ने कहा कि 20 साल पहले इसी स्कूल से उनके बच्चे पढ़कर निकले थे। तब 60 बच्चे होते थे। अब गांव के लोग शहर चले गए। खेती में आमदनी नहीं है। जो बचे हैं वे बच्चों को प्राइवेट में पढ़ा रहे हैं।
एक महिला ने कहा कि सरकार को पहले ही इस स्कूल को बंद कर देना चाहिए था। इससे बिजली, पानी और वेतन का पैसा बचता।
शिक्षा विशेषज्ञ क्या कहते हैं
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नरवाटिकरा सिर्फ एक उदाहरण है। छत्तीसगढ़ में ऐसे सैकड़ों स्कूल हैं जहां 5 से कम बच्चे हैं। ग्रामीण पलायन, निजी स्कूलों का बढ़ता क्रेज और सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता की कमी इसकी मुख्य वजह है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को दो काम करने चाहिए। पहला: छोटे-छोटे स्कूलों को पास के बड़े स्कूल में मर्ज कर देना चाहिए। बच्चों के लिए मुफ्त बस की व्यवस्था हो। दूसरा: सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारनी चाहिए ताकि अभिभावकों का भरोसा लौटे।
करोड़ों का सवाल
एक अनुमान के मुताबिक एक शिक्षक का औसत वेतन 40 हजार महीना है। रसोइया और सफाई कर्मी मिलाकर 20 हजार। मतलब हर महीने 1 लाख रुपये सिर्फ वेतन पर खर्च हो रहे हैं। साल का 12 लाख। 5 साल में 60 लाख। और एक भी बच्चा नहीं पढ़ा।
बिजली, पानी, रखरखाव का खर्च अलग। सवाल उठता है कि क्या इस पैसे का बेहतर उपयोग नहीं हो सकता था।
आगे क्या होगा
अभी प्रशासन कलेक्टर के आदेश का इंतजार कर रहा है। यदि स्कूल स्थानांतरित होता है तो हो सकता है कि पास के किसी गांव में इसकी जरूरत हो। यदि भवन को किसी और काम में लिया जाता है तो सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग नहीं होगा।
लेकिन तब तक नरवाटिकरा का यह स्कूल एक मिसाल बन गया है। एक ऐसी मिसाल जो बताती है कि कागज पर स्कूल चल रहा है, रजिस्टर में हाजिरी लग रही है, लेकिन जमीन पर शिक्षा गायब है।
निष्कर्ष
नरवाटिकरा की यह कहानी सिर्फ जशपुर की नहीं है। यह पूरे देश के ग्रामीण इलाकों की कहानी है। जहां लोग बेहतर भविष्य के लिए गांव छोड़ रहे हैं। जहां सरकारी सिस्टम अपनी जगह पर है लेकिन लोग उससे दूर जा रहे हैं।
जरूरत है कि सरकार योजनाएं जमीन पर उतारे। सिर्फ बिल्डिंग और स्टाफ से स्कूल नहीं चलते। विश्वास चाहिए। और वह विश्वास तभी लौटेगा जब सरकारी स्कूल में भी वही पढ़ाई होगी जो प्राइवेट में होती है।
जब तक ऐसा नहीं होगा, नरवाटिकरा जैसे स्कूलों के ताले रोज खुलते रहेंगे, घंटी बजती रहेगी, लेकिन क्लास में आवाज नहीं आएगी।
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*संवाददाता: अनिल अग्निहोत्री, जशपुर*
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