*मूल श्लोक + हिंदी अर्थ + पूरी व्याख्या* अध्याय 1 से 5 तक पूरा।
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गरुड़ पुराण पूर्व खंड
#### अध्याय 1: गरुड़ प्रश्न
श्लोक 1
सूत उवाच
नैमिषे निमिषारण्ये ऋषयो दीर्घसत्रिणः।
पप्रच्छुः सूतमासीनं शौनकः प्रवरः ऋषिः॥
अर्थ: सूत जी बोले – नैमिषारण्य में 1000 साल का यज्ञ कर रहे ऋषियों में श्रेष्ठ शौनक जी ने बैठे हुए सूत जी से पूछा।
श्लोक 2
गरुड उवाच
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
कथयस्व महाभाग लोकानां हितकाम्यया॥
अर्थ: गरुड़ जी बोले – हे भगवन आप सब धर्म और शास्त्र जानते हैं। लोकों के कल्याण के लिए कृपा करके उपदेश दीजिए।
श्लोक 3
कथं सृष्टिर्भवेद्ब्रह्मन् कथं पाल्यं जगत्त्रयम्।
कथं संह्रियते चान्ते कथं कर्मफलं भवेत्॥
अर्थ: हे ब्रह्मन् सृष्टि कैसे होती है, तीनों लोक कैसे चलते हैं, अंत में कैसे नाश होता है, कर्म का फल क्या है, ये सब बताइए।
श्लोक 4
श्री भगवान उवाच
साधु पृष्टं त्वया तात लोकानां हितकाम्यया।
गोप्याद् गोप्यतरं ज्ञानं वक्ष्यामि शृणु तार्क्ष्य॥
अर्थ: भगवान विष्णु बोले – हे तात तुमने बहुत अच्छा पूछा। ये सबसे गुप्त ज्ञान है। हे गरुड़ सुनो, मैं तुम्हें बताता हूं।
व्याख्या: अध्याय 1 में भूमिका है। गरुड़ जी ने 16 सवाल पूछे। सृष्टि, कर्म, मृत्यु, नरक, मोक्ष के बारे में। भगवान ने कहा ये सुनने से 7 जन्म के पाप कटते हैं।
#### अध्याय 2: सृष्टि उत्पत्ति
श्लोक 1
सर्वादौ सलिलमासीत् तस्मिन्नारायणः स्थितः।
नाभिकमलसम्भूतो ब्रह्मा लोकपितामहः॥
अर्थ: सबसे पहले सिर्फ जल था। उस जल में भगवान नारायण शेषनाग पर थे। उनकी नाभि कमल से लोकों के पिता ब्रह्मा पैदा हुए।
श्लोक 2
ब्रह्मणः मानसाः पुत्रा दशैते मुनयो मताः।
मरीचिरत्र्यङ्गिराश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः॥
अर्थ: ब्रह्मा जी के मन से 10 पुत्र हुए – मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु।
श्लोक 3
वसिष्ठः प्रचेताश्च पुलहश्चैव सप्तमः।
दक्षो भृगुर्नारदश्च दशैते मुनयो मताः॥
अर्थ: वशिष्ठ, प्रचेता, पुलह, दक्ष, भृगु, नारद। ये 10 मानस पुत्र माने गए।
श्लोक 4
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चेति प्रकीर्तितः॥
अर्थ: मैंने गुण और कर्म के अनुसार 4 वर्ण बनाए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
व्याख्या: ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची। देव, दानव, मनुष्य सब इन्हीं से चले। 4 वर्ण और 4 आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास भी बताए। जो अपने धर्म पर चले उसे सुख मिला।
#### अध्याय 3: काल और युग
श्लोक 1
मानुषैः सहस्रैर्द्वे देवस्यैकमहः स्मृतम्।
तस्यैव द्विगुणो रात्रिः प्रोक्ता देवर्षिभिः॥
अर्थ: मनुष्यों के 360 दिन का देवताओं का 1 दिन रात होता है।
श्लोक 2
कृते युगं दशवर्षसहस्राणि चतुःशतम्।
त्रेतायां त्रिसहस्राणि द्वापरे द्वे कलौ सहस्रम्॥
अर्थ: सतयुग 4800, त्रेता 3600, द्वापर 2400, कलियुग 1200 देव वर्ष का है।
श्लोक 3
तपः परं कृते युगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमेवाहुः दानमेव कलौ युगे॥
अर्थ: सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ, कलियुग में दान सबसे बड़ा धर्म है।
श्लोक 4
कलौ केशवकीर्तनात् नरो मुच्येत बन्धनात्।
अर्थ: कलियुग में सिर्फ भगवान का नाम लेने से मनुष्य बंधन से मुक्त हो जाता है।
व्याख्या: 4 युगों का वर्णन। कलियुग में लोग कम आयु, पापी होंगे। पर नाम जप से तुरंत मुक्ति का रास्ता है।
#### अध्याय 4: लोक और सूर्य
श्लोक 1
भूर् भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यमिति सप्तकः।
अतलं वितलं चैव सुतलं तलातलम्॥
अर्थ: 7 ऊपर लोक – भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य। 7 नीचे लोक – अतल, वितल, सुतल, तलातल।
श्लोक 2
महातलं रसातलं पातालं चेति सप्तमम्।
अर्थ: महातल, रसातल और पाताल ये सातवां लोक है।
श्लोक 3
सप्ताश्वो हरितो रथः सूर्यस्य कथितो मया।
अरुणः सारथिस्तस्य सर्वलोकस्य साक्षिणः॥
अर्थ: सूर्य का रथ 7 हरे घोड़ों का है। अरुण सारथी हैं। सूर्य सब लोकों के साक्षी हैं।
व्याख्या: ब्रह्मांड 14 लोक का है। सूर्य रोज निकलकर सबको जीवन देते हैं। जो सूर्य को अर्घ्य और गायत्री जपता है उसे आरोग्य मिलता है।
#### अध्याय 5: तीर्थ व्रत दान
श्लोक 1
गयायां श्राद्धं कृत्वा तु पितॄणां तृप्तिमावहेत्।
काश्यां मरणमुक्तिः स्यात् प्रयागे तु फलाधिकम्॥
अर्थ: गया में श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं। काशी में मरने से मुक्ति। प्रयाग में दान का फल 10 गुना।
श्लोक 2
गोदानं सर्वदानेभ्यः श्रेष्ठमाहुर्मनीषिणः।
अन्नदानं परं दानं विद्यादानं ततः परम्॥
अर्थ: गौ दान सबसे श्रेष्ठ है। उससे बड़ा अन्न दान। उससे भी बड़ा विद्या दान।
श्लोक 3
एकादशीं समाश्रित्य यो नरः संयतेन्द्रियः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
अर्थ: जो एकादशी का व्रत रखकर इंद्रियों को काबू में रखता है, वो सब पाप से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।
व्याख्या: पाप काटने के 3 उपाय। तीर्थ यात्रा, व्रत रखना, दान करना। रोज गीता या विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ने वाले को यम का भय नहीं।
गरुड़ पुराण पुर्वखंड अध्याय 1 से 5 तक पूरा श्लोक सहित है। अब आगे 1 से 10 अगले समय दी जायेगी।





















