बलौदाबाजार/पलारी। संवाददाता विनोद चौहान
छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के पलारी थाना क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा कथित फर्जी स्थानांतरण आदेश का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। सरकारी दस्तावेज में कथित तौर पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के जाली हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर स्थानांतरण आदेश तैयार करने के मामले में पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। प्रारंभिक कार्रवाई में चार आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने जांच आगे बढ़ाते हुए दो और आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इसके साथ ही इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।
मामला स्वास्थ्य विभाग में पदस्थ ग्रामीण चिकित्सा सहायक (RMA) करण कुमार देवांगन से जुड़ा बताया जा रहा है। पुलिस जांच के अनुसार करण देवांगन ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) रोहांसी से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मोपर, विकासखंड भाटापारा में स्थानांतरण दर्शाने वाला एक आदेश विभागीय कार्यालय में प्रस्तुत किया था। इस दस्तावेज पर स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के कथित जाली हस्ताक्षर और फर्जी कार्यालय क्रमांक एवं तारीख का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है।
बीएमओ की शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
इस पूरे मामले की शुरुआत पलारी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) डॉ. पंकज वर्मा की शिकायत से हुई। शिकायत के अनुसार स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय में एक स्थानांतरण एवं कार्यमुक्ति आदेश प्रस्तुत किया गया था। दस्तावेज की सत्यता पर संदेह होने के बाद संबंधित अधिकारियों से इसकी जांच कराई गई।
जांच में कथित रूप से सामने आया कि प्रस्तुत स्थानांतरण आदेश CMHO कार्यालय से जारी नहीं हुआ था। इसके बाद मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस को शिकायत दी गई और पलारी थाने में अपराध दर्ज कर जांच शुरू की गई।
14 अगस्त 2026 का बताया गया था फर्जी आदेश
जांच में सामने आए विवरण के अनुसार कथित फर्जी दस्तावेज पर 14 अगस्त 2026 की तारीख अंकित थी। इसमें करण कुमार देवांगन का स्थानांतरण PHC रोहांसी से PHC मोपर किए जाने की बात दर्शाई गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक दस्तावेज में स्वास्थ्य विभाग के CMHO कार्यालय का कथित फर्जी आदेश क्रमांक भी दर्ज किया गया था।
पुलिस के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य संवर्ग के कर्मचारियों के स्थानांतरण का अधिकार राज्य शासन के स्तर पर होता है। इसके बावजूद कथित तौर पर ऐसा दस्तावेज तैयार किया गया जिसे वास्तविक सरकारी आदेश के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी आधार पर पुलिस ने मामले को कूटरचना और धोखाधड़ी से जोड़ते हुए जांच आगे बढ़ाई।
पहले चार आरोपी गिरफ्तार
पलारी पुलिस ने 22 अगस्त 2026 को इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आरोपियों में करण कुमार देवांगन, रवि कुमार सेन, पुनीराम पटेल और किशना उर्फ कृष्ण कुमार अवस्थी शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार इनमें करण देवांगन और रवि कुमार सेन स्वास्थ्य विभाग में ग्रामीण चिकित्सा सहायक के रूप में पदस्थ बताए गए हैं, जबकि पुनीराम पटेल और कृष्ण कुमार अवस्थी के राजनीतिक पदों का भी उल्लेख सामने आया है।
पुलिस की कार्रवाई के बाद इस मामले ने राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा पैदा की। विभिन्न रिपोर्टों में कृष्ण कुमार अवस्थी को भाजपा का जिला महामंत्री और पुनीराम पटेल को जिला उपाध्यक्ष बताया गया है। हालांकि पूरे मामले में आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और पुलिस जांच पूरी होने के बाद ही होगी।
जांच आगे बढ़ी तो दो और नाम सामने आए
मामले की विवेचना के दौरान पुलिस ने रविवार को दो और आरोपियों को गिरफ्तार किया। परख कश्यप और प्रणव अवस्थी की गिरफ्तारी के बाद इस प्रकरण में कुल गिरफ्तार आरोपियों की संख्या छह हो गई। यह जानकारी 23 अगस्त 2026 को प्रकाशित रिपोर्टों में सामने आई है।
दो अतिरिक्त गिरफ्तारियों से संकेत मिलता है कि पुलिस अब केवल कथित फर्जी आदेश प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहकर दस्तावेज तैयार करने, उसके इस्तेमाल और कथित तौर पर इसमें सहयोग करने वाले अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच कर रही है।
व्हाट्सऐप के जरिए पहुंची थी आदेश की कॉपी
जांच से जुड़े प्रकाशित विवरणों के अनुसार फर्जी स्थानांतरण आदेश की एक कॉपी 17 अगस्त 2026 को व्हाट्सऐप के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय तक पहुंची थी। जब विभागीय स्तर पर दस्तावेज की जांच की गई तो उसके वास्तविक सरकारी आदेश होने पर सवाल खड़े हुए। सत्यापन के बाद इसे फर्जी पाए जाने की बात सामने आई, जिसके बाद पुलिस में शिकायत की गई।
यह घटना सरकारी विभागों में डिजिटल माध्यम से भेजे जाने वाले दस्तावेजों की सत्यता जांचने और आधिकारिक आदेशों के प्रमाणीकरण की व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेज को वास्तविक सरकारी आदेश बताकर इस्तेमाल करता है तो इससे न केवल विभागीय प्रशासन प्रभावित हो सकता है, बल्कि कर्मचारियों की पदस्थापना और सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है।
इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला
पलारी थाने में इस प्रकरण में अपराध क्रमांक 347/2026 दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 336(3), 337, 338, 340(2) और 3(5) के तहत कार्रवाई की है। ये धाराएं धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार करने तथा उसका इस्तेमाल करने सहित अन्य संबंधित अपराधों से जुड़ी बताई गई हैं।
पुलिस ने आरोपियों से पूछताछ के आधार पर मामले की कड़ियां जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है। अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना है कि कथित फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किया, उसमें इस्तेमाल किए गए हस्ताक्षर और अन्य विवरण कहां से लिए गए तथा दस्तावेज को सरकारी कार्यालय तक किस माध्यम से पहुंचाया गया।
राजनीतिक कनेक्शन की भी चर्चा
मामले में दो राजनीतिक पदाधिकारियों के नाम सामने आने के कारण यह प्रकरण केवल स्वास्थ्य विभाग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया है। प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक भाजपा ने मामले में नाम सामने आने के बाद अपने दो पदाधिकारियों के खिलाफ संगठनात्मक कार्रवाई भी की है।
हालांकि राजनीतिक जुड़ाव अपने आप में किसी व्यक्ति को अपराधी साबित नहीं करता। सभी आरोपियों के संबंध में अंतिम स्थिति अदालत में चलने वाली कानूनी प्रक्रिया और जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी। समाचार रिपोर्ट में आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
करीब छह आरोपियों तक पहुंची जांच
पहले चार लोगों की गिरफ्तारी के बाद दो और आरोपियों की गिरफ्तारी इस बात की ओर इशारा करती है कि पुलिस मामले की गहराई से पड़ताल कर रही है। जांच एजेंसियां कथित फर्जी आदेश की तैयारी से लेकर उसे विभाग में प्रस्तुत किए जाने तक की पूरी प्रक्रिया को जोड़ने में जुटी हैं।
पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर सकती है कि दस्तावेज तैयार करने में किसी कंप्यूटर, प्रिंटर, डिजिटल फाइल या ऑनलाइन माध्यम का इस्तेमाल हुआ था या नहीं। यदि डिजिटल साक्ष्य सामने आते हैं तो साइबर जांच के जरिए दस्तावेज की उत्पत्ति और उसके निर्माण में शामिल लोगों की भूमिका की पुष्टि करने में मदद मिल सकती है।
सरकारी दस्तावेजों की सुरक्षा पर सवाल
यह पूरा प्रकरण सरकारी दस्तावेजों की प्रमाणिकता और सत्यापन प्रणाली को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। सरकारी विभाग में किसी कर्मचारी का स्थानांतरण केवल प्रशासनिक आदेश नहीं होता, बल्कि उससे कर्मचारी की पदस्थापना, वेतन, कार्यभार और सेवा रिकॉर्ड जैसे कई महत्वपूर्ण विषय जुड़े होते हैं। ऐसे में यदि कोई फर्जी आदेश वास्तविक आदेश के रूप में इस्तेमाल किया जाता है तो उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
स्वास्थ्य विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में इस प्रकार के कथित फर्जीवाड़े की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों की पदस्थापना सीधे आम लोगों की स्वास्थ्य सुविधाओं को प्रभावित कर सकती है।
पुलिस जांच जारी
पलारी पुलिस द्वारा छह आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद भी मामले की जांच पूरी नहीं हुई है। पुलिस कथित फर्जी दस्तावेज, उसके निर्माण, इस्तेमाल और उससे जुड़े अन्य संभावित लोगों की भूमिका की जांच कर रही है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मामले में आगे की वैधानिक कार्रवाई और विवेचना जारी है।
इस मामले में आगे यदि पुलिस को नए दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य या अन्य आरोपियों की भूमिका से जुड़े तथ्य मिलते हैं तो प्रकरण में और कार्रवाई हो सकती है। फिलहाल छह आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ मामला और गंभीर हो गया है तथा अब जांच का दायरा बढ़ गया है।
ग्रामीण भारत न्यूज के लिए—संवाददाता विनोद चौहान
नोट: इस खबर में आरोपियों के संबंध में प्रकाशित पुलिस/मीडिया रिपोर्टों में सामने आए आरोपों का उल्लेख किया गया है। आरोप सिद्ध होना न्यायालय की अंतिम प्रक्रिया पर निर्भर है।





















