ग्रामीण भारत न्यूज | संवाददाता — विनिता चौहान
नई दिल्ली। भारत के गांवों की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका अब केवल परिवार और घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं रह गई है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं आज उद्यमी, बैंक सखी, कृषि सखी, पशु सखी और ड्रोन पायलट के रूप में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं। ‘लखपति दीदी’ से लेकर ‘नमो ड्रोन दीदी’ तक का सफर ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण की बदलती तस्वीर को सामने रखता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 तक 3.07 करोड़ ग्रामीण महिलाएं ‘लखपति दीदी’ पहल के तहत परिवार की सालाना आय एक लाख रुपये से अधिक करने की दिशा में सक्षम हुई हैं। यह पहल स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आजीविका, उद्यम और आय के नए अवसरों से जोड़ने पर केंद्रित है।
स्वयं सहायता समूह बने आर्थिक बदलाव का आधार
ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। महिलाएं समूहों के माध्यम से छोटे व्यवसाय, कृषि आधारित गतिविधियां, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों के कारोबार से जुड़ रही हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, देशभर में 10 करोड़ से अधिक महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। इन समूहों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम माना जा रहा है।
खेतों में ड्रोन, हाथों में तकनीक
महिला सशक्तिकरण का नया चेहरा अब खेतों में ड्रोन उड़ाती महिलाएं भी हैं। ‘नमो ड्रोन दीदी’ पहल के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को ड्रोन संचालन और कृषि में उसके उपयोग से जुड़े अवसर मिल रहे हैं।
ड्रोन के जरिए फसलों में उर्वरक और कीटनाशक के छिड़काव जैसे कार्य अधिक तेजी और दक्षता से किए जा सकते हैं। इससे एक ओर किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध होती है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाओं के लिए नई आय का रास्ता खुलता है। सरकारी दस्तावेज के अनुसार, इस पहल के तहत 2023-24 में 500 ड्रोन वितरित किए गए थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है कि ड्रोन दीदी अभियान से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खेती में नई संभावनाएं पैदा हुई हैं तथा ड्रोन का संचालन करने वाली महिलाओं की सामाजिक प्रतिष्ठा में भी बदलाव आया है।
आय के साथ बढ़ रहा आत्मविश्वास
महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का असर केवल उनकी व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं है। जब महिला की अपनी आमदनी बढ़ती है तो परिवार के खर्च, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की योजनाओं में उसकी निर्णय लेने की भूमिका भी मजबूत होती है।
‘लखपति दीदी’ पहल का उद्देश्य भी महिलाओं को ऐसी स्थायी आजीविका से जोड़ना है, जिससे परिवार की वार्षिक आय में उनका प्रत्यक्ष योगदान बढ़े। यही कारण है कि गांवों में महिला उद्यमिता को ग्रामीण विकास की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
बैंक सखी से कृषि सखी तक बढ़ा दायरा
ग्रामीण महिलाओं की भूमिका अब वित्तीय सेवाओं और कृषि सलाह तक भी पहुंच रही है। बैंक सखियां गांवों में लोगों को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ने में मदद कर रही हैं, जबकि कृषि सखी और पशु सखी जैसी पहल महिलाओं को कृषि एवं पशुपालन से संबंधित गतिविधियों में नई जिम्मेदारियां दे रही हैं।
इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गांव की महिला अब केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की भागीदार और सेवा प्रदाता के रूप में सामने आ रही है।
लक्ष्य अब और बड़ा
महिला आर्थिक सशक्तिकरण को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने लखपति दीदियों की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। मार्च 2026 में केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया था कि 3 करोड़ लखपति दीदी का लक्ष्य हासिल हो चुका है और आगे 3 करोड़ अतिरिक्त महिलाओं को लखपति दीदी बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे कुल संख्या 6 करोड़ तक पहुंचाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
बदल रहा है गांव का सामाजिक नजरिया
इस पूरी प्रक्रिया का असर गांव की सामाजिक सोच पर भी दिखाई दे रहा है। जिस महिला की पहचान पहले केवल परिवार और घरेलू जिम्मेदारियों से होती थी, वही महिला अब कारोबार चला रही है, बैंकिंग सेवाएं दे रही है, कृषि तकनीक का इस्तेमाल कर रही है और ड्रोन पायलट के रूप में काम कर रही है।
यही बदलाव ग्रामीण भारत की नई तस्वीर को सामने लाता है—जहां महिला आर्थिक गतिविधियों की सिर्फ सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता बन रही है।
‘लखपति दीदी’ से ‘ड्रोन दीदी’ तक की यात्रा बताती है कि जब ग्रामीण महिलाओं को वित्त, तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने के अवसर मिलते हैं, तो उसका असर केवल एक परिवार पर नहीं बल्कि पूरे गांव की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
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संवाददाता: विनिता चौहान





















