नावापाली के खसरा नंबर 32/2 और 55/7 का मामला, नामांतरण की प्रक्रिया और दस्तावेजों पर ग्रामीण भारत न्यूज की पैनी नजर
रायगढ़। ग्राम नावापाली, पटवारी हल्का नंबर-8 में स्थित खसरा नंबर 32/2 एवं 55/7 की भूमि को लेकर ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने भूमि के नामांतरण की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि यह भूमि जोगीराम चौहान पिता सकुल (सूकूल) चौहान को शासन की ओर से भूमिदान के तहत प्राप्त हुई थी। जोगीराम चौहान की मृत्यु के बाद इसी भूमि के अधिकार और नामांतरण को लेकर अब कई गंभीर प्रश्न सामने आ रहे हैं।
ग्रामीण भारत न्यूज की प्रारंभिक पड़ताल में सामने आई जानकारी के अनुसार जोगीराम चौहान तीन भाइयों में से एक थे और उनके स्वयं कोई पुत्र-पुत्री नहीं थे। उनका अपने मझले भाई के परिवार से संपर्क बना हुआ था तथा उनका आना-जाना भी मझले भाई के घर बताया जाता है।
मौत की खबर मिलते ही पहुंचे मझले भाई के बेटे
स्थानीय लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जोगीराम चौहान की मृत्यु के बाद गांव से उनके मझले भाई के पुत्रों को सूचना दी गई। सूचना मिलने के बाद वे गांव पहुंचे और जोगीराम चौहान का अंतिम संस्कार किया। इसके बाद दशकर्म एवं अन्य पारिवारिक संस्कार भी उनके द्वारा किए जाने की बात सामने आई है।
दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जा रहा है कि उस समय जोगीराम के बड़े भाई के पुत्र-पुत्रियों की मौजूदगी नहीं थी।
यहीं से मामले में एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—जिस समय जोगीराम की मृत्यु हुई, उस समय उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी किसने निभाई और बाद में उनकी जमीन पर दावा किस आधार पर सामने आया?
जमीन सामने आते ही बदले रिश्तों के समीकरण?
स्थानीय सूत्रों के अनुसार जोगीराम चौहान की मृत्यु के बाद उनके बड़े भाई के पुत्र-पुत्रियों के सामने आने के पश्चात भूमि को लेकर विवाद की स्थिति बनी।
आरोप है कि मझले भाई के पुत्रों के साथ विवाद और धमकी जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हुईं, जिसके कारण वे मामले को आगे बढ़ाने से पीछे हट गए।
इसके बाद भूमि के नामांतरण को लेकर सवाल उठने लगे।
क्या नामांतरण से पहले सभी संभावित वारिसों की जानकारी ली गई थी? क्या सभी संबंधित पक्षों को सूचना दी गई थी? और जिस आधार पर नामांतरण हुआ, वह दस्तावेज वास्तव में वैध थे?
इन सवालों का जवाब अब राजस्व रिकॉर्ड और नामांतरण की मूल फाइल से ही मिल सकेगा।
निवास प्रमाण-पत्र भी जांच के घेरे में
मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। ग्रामीण भारत न्यूज को मिली जानकारी के अनुसार भूमि रिकॉर्ड में कुछ कथित वारिसों का निवास जिस स्थान का दर्शाया गया है, स्थानीय स्तर पर उस निवास को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
यदि संबंधित व्यक्ति वास्तव में वहां निवास नहीं करते थे तो सवाल यह है कि निवास संबंधी प्रमाण-पत्र किस आधार पर जारी हुआ?
क्या मौके पर सत्यापन हुआ था?
क्या संबंधित दस्तावेजों की जांच की गई थी?
किस रिकॉर्ड के आधार पर निवास प्रमाणित किया गया?
और नामांतरण में उस प्रमाण का इस्तेमाल हुआ या नहीं?
इन सभी बिंदुओं की जांच अब जरूरी हो गई है।
फर्जी दस्तावेज के आरोपों की भी होगी पड़ताल
भूमि विवाद में कुछ पक्षों द्वारा फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नामांतरण कराने का आरोप लगाया जा रहा है। हालांकि किसी दस्तावेज को फर्जी घोषित करना जांच और प्रमाण के बाद ही संभव है।
इसीलिए ग्रामीण भारत न्यूज इस मामले में आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणिकता और सरकारी रिकॉर्ड का मिलान करेगा।
भूमि आवंटन से लेकर नामांतरण तक की पूरी कड़ी खंगाली जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल: नामांतरण हुआ तो किस आधार पर?
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज नामांतरण की मूल कार्यवाही है।
जांच का विषय यह रहेगा कि—
- नामांतरण आवेदन किसने प्रस्तुत किया?
- आवेदन के साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए?
- वारिसान संबंधी जानकारी किस आधार पर तैयार हुई?
- जोगीराम चौहान के अन्य संभावित रिश्तेदारों की जानकारी दर्ज की गई या नहीं?
- संबंधित पक्षों को नोटिस अथवा सूचना दी गई या नहीं?
- किसी व्यक्ति ने आपत्ति दर्ज की थी या नहीं?
- नामांतरण आदेश किस अधिकारी ने पारित किया?
- वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड में भूमि किन लोगों के नाम दर्ज है?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही विवाद की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
अंतिम संस्कार करने वालों को अधिकार मिला या नहीं, यह भी जांच का विषय
ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि जोगीराम चौहान की मृत्यु के बाद जिन लोगों ने उनके अंतिम संस्कार और अन्य संस्कारों की जिम्मेदारी निभाई, उन्हें बाद की भूमि संबंधी प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं मिली।
हालांकि कानूनी रूप से केवल अंतिम संस्कार करना किसी व्यक्ति को भूमि का स्वामित्व नहीं देता। भूमि का अधिकार उत्तराधिकार कानून, भूमि आवंटन की शर्तों और वैध राजस्व दस्तावेजों के आधार पर निर्धारित होगा।
इसी कारण इस पूरे मामले में भावनात्मक दावों के बजाय दस्तावेज और कानून सबसे महत्वपूर्ण होंगे।
ग्रामीण भारत न्यूज की पड़ताल में कई दस्तावेज होंगे अहम
इस मामले की निष्पक्ष पड़ताल के लिए ग्रामीण भारत न्यूज निम्न दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जानकारी जुटाने का प्रयास करेगा—
भूमिदान/आवंटन रिकॉर्ड, खसरा-पंचसाला, बी-1, नामांतरण आदेश, आवेदन पत्र, वारिसान संबंधी दस्तावेज, मृत्यु प्रमाण-पत्र, निवास संबंधी दस्तावेज तथा अन्य उपलब्ध राजस्व अभिलेख।
इन रिकॉर्डों के आपसी मिलान से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि भूमि का रिकॉर्ड कब और किस प्रक्रिया से बदला।
किसी को दोषी ठहराना उद्देश्य नहीं, सच सामने लाना मकसद
ग्रामीण भारत न्यूज स्पष्ट करना चाहता है कि इस रिपोर्ट में सामने आए आरोपों को जांच के विषय के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी व्यक्ति को बिना आधिकारिक जांच के दोषी ठहराना हमारा उद्देश्य नहीं है।
यदि किसी पक्ष के पास वैध दस्तावेज और अपना पक्ष है तो उसे भी सामने आने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
वहीं यदि जांच में दस्तावेजों में गड़बड़ी, गलत जानकारी, तथ्य छिपाने या नियमों के विपरीत नामांतरण की पुष्टि होती है तो संबंधित सक्षम अधिकारियों के समक्ष मामले को उठाया जाएगा।
अब निगाह राजस्व रिकॉर्ड पर
जोगीराम चौहान पिता सकुल (सूकूल) चौहान को शासन से मिली बताई जा रही भूमिदान की जमीन आखिर वर्तमान में किसके नाम है और वह नाम किस आधार पर दर्ज हुआ—यह इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
खसरा नंबर 32/2 और 55/7 की जमीन का रिकॉर्ड क्या कहता है?
नामांतरण की फाइल में कौन-कौन से दस्तावेज मौजूद हैं?
निवास संबंधी रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी कितनी सही है?
और क्या नामांतरण की प्रक्रिया में सभी आवश्यक पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला था?
इन सवालों के जवाब दस्तावेजी जांच के बाद ही सामने आएंगे।
ग्रामीण भारत न्यूज की पड़ताल जारी
ग्रामीण भारत न्यूज की टीम इस पूरे मामले से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों की पड़ताल कर रही है। जैसे-जैसे प्रमाणित जानकारी सामने आएगी, उसे पाठकों के सामने रखा जाएगा।
मामला गंभीर है, सवाल बड़े हैं और अब जवाब दस्तावेजों से चाहिए।
सच क्या है, यह जानने के लिए जुड़े रहिए ग्रामीण भारत न्यूज के साथ।
संवाददाता — अतुल अग्निहोत्री
ग्रामीण भारत न्यूज





















