वन विभाग ने बदली व्यवस्था, वन भूमि से जुड़े विकास कार्यों के मामलों को प्राथमिकता से सुलझाने के निर्देश; जिला प्रशासन और वन विभाग के बीच बेहतर तालमेल पर जोर
भोपाल। मध्य प्रदेश में वन विभाग से जुड़े प्रशासनिक कामकाज और विकास परियोजनाओं के समन्वय को लेकर महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब जिलों में पदस्थ वनमंडलाधिकारी (DFO) को कलेक्टर की अध्यक्षता में होने वाली समय-सीमा (TL) बैठक में स्वयं उपस्थित होना अनिवार्य होगा। DFO अपनी अनुपस्थिति में किसी अधीनस्थ अधिकारी या प्रतिनिधि को बैठक में भेजकर जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकेंगे।
वन विभाग के प्रमुख सचिव राघवेंद्र सिंह की ओर से इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य जिला प्रशासन और वन विभाग के बीच सीधा समन्वय स्थापित करना तथा ऐसे मामलों का तेजी से निराकरण करना है, जिनकी वजह से विकास कार्यों और सरकारी परियोजनाओं में देरी होती है।
अब प्रतिनिधि भेजने की व्यवस्था पर रोक
जिलों में कलेक्टर की अध्यक्षता में होने वाली TL बैठकों में विभिन्न विभागों के लंबित मामलों और महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषयों की समीक्षा की जाती है। वन विभाग से संबंधित मामलों में अब DFO की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर दिया गया है।
नई व्यवस्था के तहत DFO को अपने स्थान पर किसी अन्य अधिकारी को बैठक में भेजने के बजाय स्वयं उपस्थित होकर विभाग से संबंधित विषयों की जानकारी देनी होगी। इससे लंबित मामलों पर मौके पर ही चर्चा और संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर समाधान निकालने की प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।
वन भूमि प्रभावित परियोजनाओं पर विशेष ध्यान
सरकार के निर्देशों में वन भूमि से प्रभावित विकास कार्यों को विशेष प्राथमिकता देने की बात कही गई है। सड़क, भवन, अधोसंरचना अथवा अन्य सरकारी विकास परियोजनाओं से जुड़े ऐसे मामलों में जहां वन भूमि का मुद्दा सामने आता है, वहां विभागीय स्तर पर अनावश्यक देरी को कम करने का प्रयास किया जाएगा।
DFO को संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ सीधे संपर्क में रहकर लंबित मामलों का समाधान कराने की जिम्मेदारी निभानी होगी। इसका उद्देश्य यह है कि वन भूमि से जुड़े अनुमोदन, आपत्तियों अथवा अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण महत्वपूर्ण विकास कार्य लंबे समय तक अटके न रहें।
जिला प्रशासन और वन विभाग में बढ़ेगा तालमेल
वन विभाग से जुड़े जिन मामलों में जिला प्रशासन अथवा किसी अन्य विभाग की भूमिका है, उन्हें आपसी समन्वय से सुलझाने पर जोर दिया गया है। इसके लिए अधिकारियों के बीच बेहतर संवाद और नियमित समीक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है।
माना जा रहा है कि DFO की TL बैठक में प्रत्यक्ष मौजूदगी से जिला स्तर पर चल रहे वन विभाग से संबंधित मामलों की वास्तविक स्थिति कलेक्टर के सामने स्पष्ट रूप से रखी जा सकेगी। साथ ही संबंधित विभागों के अधिकारियों के बीच तत्काल चर्चा होने से निर्णय लेने की प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी हो सकती है।
लंबित फाइलों के निपटारे में तेजी लाने का प्रयास
सरकार की इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य प्रशासनिक स्तर पर लंबित मामलों और फाइलों के निपटारे की गति बढ़ाना भी है। कई बार किसी विकास कार्य से संबंधित मामला अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय के अभाव में लंबित रहता है। ऐसी स्थिति में अधिकारियों के बीच सीधा संवाद नहीं होने से प्रक्रिया लंबी हो जाती है।
नई व्यवस्था के तहत वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी को स्वयं बैठक में मौजूद रहकर संबंधित मामले की जानकारी देनी होगी। इससे समस्या की पहचान, संबंधित विभाग से चर्चा और आगे की कार्रवाई को एक ही मंच पर आगे बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
अधिकारियों को निर्देशों का कड़ाई से पालन करने को कहा
वन विभाग की ओर से जारी दिशा-निर्देशों में अधिकारियों को नई व्यवस्था का गंभीरता से पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है। विभागीय मामलों को केवल पत्राचार तक सीमित रखने के बजाय जिला प्रशासन के साथ प्रत्यक्ष समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया गया है।
इस बदलाव से खास तौर पर वे विकास कार्य प्रभावित होने से बच सकते हैं, जिनमें वन भूमि या वन विभाग से संबंधित अनुमति और प्रक्रियाएं जुड़ी होती हैं। प्रशासनिक स्तर पर तेजी आने से आम लोगों और विकास परियोजनाओं से जुड़े हितधारकों को भी इसका लाभ मिलने की उम्मीद है।
ग्रामीण भारत न्यूज के लिए
संवाददाता — झसकेतन राजहंस(राज्य प्रभारी)





















