संवाददाता: अतुल अग्निहोत्री स्थान: रायपुर, छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक सरकारी स्कूल की दो होनहार छात्राओं ने अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और कड़ी मेहनत से राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है। रायपुर के पीजी उमाथे उत्कृष्ट शासकीय विद्यालय (PG Umathe Excellent Government School) की छात्रा वर्तिका पाटिल और उमेश्वरी साहू ने ‘ब्रिक्स 2026’ (BRICS 2026) के मंच और आईआईटी तिरुपति (IIT Tirupati) में आयोजित एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपने ‘रेनवाटर हार्वेस्टिंग’ (वर्षा जल संचयन) और जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी पर आधारित प्रोजेक्ट के लिए अंतरराष्ट्रीय जजों से भारी प्रशंसा बटोरी है।
यह प्रतियोगिता 22 जुलाई को आयोजित की गई थी, जिसमें भारत के छह अलग-अलग राज्यों के छात्रों ने हिस्सा लिया था। पूरे छत्तीसगढ़ राज्य से एकमात्र इन्हीं दो छात्राओं का चयन इस महामुकाबले के लिए हुआ था, जो प्रदेश के शिक्षा तंत्र और यहां की प्रतिभाओं के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
क्या है ‘बिल्डिंग स्पॉन्ज सिटी टुगेदर’ प्रोजेक्ट?
वर्तिका और उमेश्वरी के इस खास प्रोजेक्ट का नाम “बिल्डिंग स्पॉन्ज सिटी टुगेदर” (Building Sponge City Together) है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य जल संरक्षण को बढ़ावा देना और भविष्य में पानी की किल्लत जैसी वैश्विक समस्या का तकनीकी समाधान खोजना है।
इस प्रोजेक्ट को तैयार करने के लिए छात्राओं ने अद्भुत सूझबूझ का परिचय दिया:
- तकनीक का इस्तेमाल: छात्राओं ने डेटा इकट्ठा करने के लिए ‘गूगल अर्थ’ (Google Earth) जैसे आधुनिक जियोस्पेशियल टूल्स का प्रभावी इस्तेमाल किया।
- व्यापक सर्वे: प्रोजेक्ट को जमीनी हकीकत से जोड़ने के लिए दोनों ने मिलकर लगभग 400 घरों का विस्तृत सर्वेक्षण (सर्वे) किया।
- जागरूकता अभियान: इस दौरान उन्होंने लोगों को जल संरक्षण के महत्व और वर्षा जल को सहेजने के वैज्ञानिक तरीकों के प्रति जागरूक भी किया।
अंतरराष्ट्रीय जजों ने इस प्रोजेक्ट की गहराई और छात्राओं की दूरदर्शिता की जमकर तारीफ की। उन्होंने छात्राओं का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि यह प्रोजेक्ट भारत को पानी की कमी जैसी गंभीर और वैश्विक चुनौती से निपटने में बड़ी मदद कर सकता है।
संघर्ष से सफलता तक: एक ऑटो चलाने वाली माँ की कहानी
इस बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि के पीछे एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक पारिवारिक संघर्ष की कहानी भी छुपी है। कक्षा 8वीं की छात्रा वर्तिका पाटिल की इस सफलता में उनकी माँ ज्योति पाटिल का सबसे बड़ा योगदान है।
“मैं कक्षा 8वीं की छात्रा हूँ। मैंने अपने पिता को खो दिया है और मेरी माँ परिवार चलाने के लिए ऑटो-रिक्शा चलाती हैं। हमने ब्रिक्स 2026 में भाग लिया और अपना प्रोजेक्ट लेकर आईआईटी तिरुपति गए। इस प्रोजेक्ट के जरिए हमें जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला।” – वर्तिका पाटिल
वर्तिका के पिता का दो साल पहले निधन हो गया था। इसके बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन उनकी माँ ज्योति पाटिल ने हार नहीं मानी। अपने तीन बच्चों का पेट पालने और उन्हें अच्छी शिक्षा देने के लिए ज्योति ने ऑटो-रिक्शा चलाना शुरू किया।
अपनी बेटी की इस शानदार उपलब्धि पर गर्व महसूस करते हुए ज्योति पाटिल ने कहा:
“मैं अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए ऑटो-रिक्शा चलाती हूँ। मेरी बेटी इस बड़ी प्रतियोगिता के लिए तिरुपति गई थी और मुझे उस पर बेहद गर्व है। मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी आगे बढ़े और वह जो भी बनना चाहती है, उसे हासिल करे। वह बड़ी होकर आईएएस (IAS) अधिकारी या फिर एक वैज्ञानिक बनना चाहती है।”
छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाती छात्राएं और शिक्षक
इस टीम की दूसरी सदस्य, कक्षा 7वीं की छात्रा उमेश्वरी साहू ने भी अपनी खुशी जाहिर करते हुए बताया कि उन्होंने सबसे पहले ब्रिक्स 2026 प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था, जिसके बाद उन्हें आईआईटी तिरुपति के आयोजन में जाने का मौका मिला। उमेश्वरी ने बताया कि छह राज्यों के प्रतिभागियों के बीच छत्तीसगढ़ से केवल उन दोनों का चुना जाना उनके लिए गर्व की बात है। वे भविष्य में इस प्रोजेक्ट को और भी बड़े स्तर पर विकसित करने की योजना बना रही हैं।
छात्राओं का मार्गदर्शन करने वाली विद्यालय की शिक्षिका मीता शुक्ला ने भी इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा:
“हमें इस बात का बेहद गर्व है कि पूरे छत्तीसगढ़ राज्य से केवल हमारे स्कूल की दो छात्राओं का चयन ब्रिक्स 2026 प्रतियोगिता के लिए हुआ। मेंटर के मार्गदर्शन में छात्राओं ने बारिश के पानी को सहेजने के महत्व को समझा और इस बेहतरीन प्रोजेक्ट का निर्माण किया। आज के समय में रेनवाटर हार्वेस्टिंग बेहद जरूरी है।”
ग्रामीण भारत न्यूज (Grameen Bharat News) इन दोनों छात्राओं के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है। यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि मजबूत इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन हो, तो सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद सरकारी स्कूलों के बच्चे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकते हैं।





















