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गरुड़ पुराण पुरर्वाध अध्याय 6 से 10 तक श्लोक एवं भावार्थ

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गरुड़ पुराण के पूर्व खण्ड (आचार खण्ड) के अध्याय 6 से 10 तक के विषयों को उनके प्रासंगिक और मूल भाव को दर्शाने वाले संस्कृत श्लोकों के साथ नीचे विस्तार से प्रस्तुत किया गया है:

अध्याय 6: भगवान विष्णु की पूजा विधि (षोडशोपचार पूजा)

इस अध्याय में भगवान विष्णु की षोडशोपचार (16 प्रकार की सामग्री से) पूजा का विस्तृत विधान है। स्नान, ध्यान और आवाहन के बाद भगवान को विभिन्न सामग्रियां अर्पित की जाती हैं।

पाद्यमर्घ्यं तथाऽऽचामं स्नानं वसनमेव च। गन्धपुष्पे धूपदीपौ नैवेद्यं च ततः परम्॥

अर्थ: भगवान के श्रीचरणों में पाद्य (जल), अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गंध (चंदन), पुष्प, धूप, दीप और उसके बाद नैवेद्य (भोग) अर्पित करना चाहिए।

  • शुद्धिकरण: पूजा से पूर्व शरीर और मन की शुद्धि के लिए प्राणायाम और आचमन आवश्यक है।
  • न्यास विधान: साधक को अपने अंगों में मन्त्रों का न्यास करके स्वयं को देवतुल्य बनाना चाहिए।
  • प्रिय पुष्प: भगवान श्रीहरि को तुलसी दल, कमल और मालती के पुष्प अत्यंत प्रिय हैं।

अध्याय 7: दीक्षा विधि और मण्डल निर्माण

सातवें अध्याय में गुरु की महिमा, आध्यात्मिक दीक्षा और पूजा के लिए ‘मण्डल’ (वेदी) निर्माण का महत्व बताया गया है। बिना दीक्षा के साधना पूर्ण फल नहीं देती।

विना दीक्षां न सिद्ध्यन्ति सत्कर्माणि च यद्यपि। तस्माद् दीक्षां प्रकुर्वीत गुरुमूले विचक्षणः॥

अर्थ: यद्यपि मनुष्य सत्कर्म करता हो, फिर भी बिना गुरु दीक्षा के आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त नहीं होतीं। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को योग्य गुरु से दीक्षा अवश्य लेनी चाहिए।

  • गुरु का महत्व: गुरु शिष्य के अज्ञान को दूर कर उसे परम मन्त्र का उपदेश देते हैं।
  • मण्डल निर्माण: दीक्षा और विशेष पूजा के समय सर्वतोभद्र आदि मण्डल बनाए जाते हैं, जिनमें सभी देवताओं का आवाहन होता है।
  • शिष्य के गुण: शिष्य को संयमी, सत्यवादी और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहिए।

अध्याय 8: नित्य कर्म और भगवान का ध्यान

इस अध्याय में गृहस्थ के दैनिक नित्य कर्म (जैसे प्रातः उठना, स्नान) और भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप के ध्यान का वर्णन है।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनकी आकृति शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के ईश्वर और संपूर्ण विश्व के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, ऐसे भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

  • प्रातःकालीन कृत्य: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होना चाहिए।
  • स्वरूप का ध्यान: भगवान के शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए तेजस्वी रूप का हृदय में ध्यान करना चाहिए।
  • ध्यान का फल: इस ध्यान से मन की चंचलता नष्ट होती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

अध्याय 9: नवव्यूह पूजा और मन्त्र महिमा

इस अध्याय में भगवान के विभिन्न विस्तारों (वासुदेव, संकर्षण आदि) की नवव्यूह उपासना और मन्त्रों के सही उच्चारण के प्रभाव का वर्णन है।

वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम्। नारायणं नृसिंहं च ध्यायेत् भक्त्या समाहितः॥

अर्थ: साधक को पूर्ण भक्ति और एकाग्रचित्त होकर भगवान के वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण और नृसिंह स्वरूप का ध्यान और पूजन करना चाहिए।

  • नवव्यूह उपासना: भगवान के इन सभी स्वरूपों की एक साथ पूजा करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • मन्त्र शक्ति: मन्त्र केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि देवताओं का साक्षात् शब्द-शरीर हैं।
  • मुद्राओं का प्रयोग: जप और पूजा के दौरान हाथों से विशेष मुद्राएं (जैसे अंजलि मुद्रा, ज्ञान मुद्रा) बनाने से देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

अध्याय 10: संध्या वन्दन और गायत्री महिमा

दसवें अध्याय में त्रिकाल संध्या (तीनों प्रहर की जाने वाली उपासना) और वेदों की माता गायत्री मन्त्र की महिमा बताई गई है।

गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी। गायत्र्यास्तु परं नास्ति दिवि चेह च पावनम्॥

अर्थ: गायत्री वेदों की माता हैं और सभी पापों का नाश करने वाली हैं। स्वर्ग और पृथ्वी लोक में गायत्री मन्त्र से बढ़कर पवित्र करने वाला अन्य कोई मन्त्र या साधन नहीं है।

  • त्रिकाल संध्या: प्रातः, मध्याह्न और सायं काल में संध्योपासन करना अनिवार्य कर्तव्य है।
  • सूर्य अर्घ्य: सूर्य नारायण को अर्घ्य देने से आयु, बुद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
  • पाप मुक्ति: जो नित्य गायत्री मन्त्र का जप करता है, वह जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त हो जाता है।

अध्याय 11 से 15 अगले रविवार को प्रकाशित किया जाएगा।

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